अल्लामा इक्बाल की शायरी

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अल्लामा इकबाल की शायरी 

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खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है 

सितारों से जहा और भी है अभी इश्क के इम्तेहान और भी है 

माना की तेरी दीद के काबिल नहीं हु में तू मेरा शौक देख मेरा इंतज़ार देख

तेरे इश्क की इन्तहा चाहता हु मेरी सादगी देख क्या चाहता हु 

तू शाही है परवाज़ है काम तेरा तेरे सामने आसमा और भी है 

हजारो साल नर्गिस अपनी बेनुरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दिदावार पैदा 

अपने मन में डूबकर पा जा सुराग-ए-ज़िन्दगी तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन 

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक्ल लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे 

दुनिया की महफ़िलो से उकता गया हु या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो 

नहीं तेरा नशेमन कस्र-ए- सुल्तानी के गुम्बद पर तू शाही है बसेरा कर पहाड़ो की चट्टानों में 

इल्म में भी सुरूर है लेकिन ये वो जन्नत है जिसमे हूर नहीं 

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है पर नहीं ताकत-ए-परवाज़ मगर रखती है 

अल्लामा इकबाल के शेर 

यु तो सैय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफगान भी हो तुम सभी कुछ हो बताओ मुसलमान भी हो  

अक्ल को तनकीद से फुर्सत नहीं इश्क पर आमाल की बुनियाद रख 

वतन की फिक्र कर नादान मुसीबत आने वाली है तेरी बरबादियो के मशवरे है आसमानों में

तेरे आजाद बन्दों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबन्दी वह जीने की पाबन्दी 

अनोखी वजह है सारे ज़माने से निराले है ये आशिक कोंसी बस्ती के या रब रहने वाले है 

बुतों से तुझको उम्मीदे खुदा से नाउम्मीदी म मुझे बता तो सही और काफिरी क्या है 

अल्लामा इकबाल की शायरी 

नहीं है न उम्मीद “इकबाल” अपनी किश्त-ए-वीरा से ज़रा नम हो तो ये मिटटी ज़रखेज़ है साकी 

बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफर दिया था क्यों कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मेरा इंतज़ार कर 

यकीं मोहकम अमल पैहम मुहब्बत फातेह-ए-आलम जिहाद-ए-जिंदगानी में है ये मर्दों की शमशीरे 

भरी बज्म में राज़ की बात कह दी बड़ा बे-अदब हु सजा चाहता हु 

तूने ये क्या गज़ब कर दिया मुझको भी फाश कर दिया मई ही तो एक राज़ था सीना ए कायनात में

आइन-ए-जवां-मर्दा हक़-गोई ओ बे-बाकि अल्लाह के शेरो को आती नहीं रुबाही 

कभी हमसे कभी गैरों से शानासाईं है बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है 

मुझे रोकेगा तू ए नाखुदा गर्क होने से की जिनको  डूबना है डूब जाते है सफीनो में 

अल्लामा इकबाल की शायरी 

निगाह बुलंद सुखन दिल-नवाज़ जां पुर-सोज यही है रखत-ए-सफ़र मीर-ए-कारवां के लिए 

न पुचो मुझसे लज्जत खामखा -बर्बाद रहने की नशेमन सैकडो मै ने बना कर फूंक डाले है 

अंदाज़-ए-बयां गरचे बहुत शौक नहीं है शायद के उतर जाये तेरे दिल में मेरी बात 

मिलेगा मंजिल-ए-मकसूद का उसी को सुराग मई तुझको बताता हु तकदीरे उमम क्या है 

शमसीर-ओ-सीना-अव्वल ताउस-ओ-रुबाब आखिर 

मोती समझ के शान-ए-करीमी चुन लिए कतरे जो थे मेरे अर्क-ए-इम्फी’आल के 

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