निकाह का पैगाम

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम 

अस्सलाम अलैकुम , आज की इस पोस्ट में हम देख्नेगे की किसी को निकाह के रिश्ते के लिए हम पैगाम दे

सकते है या नहीं हमारा मजहब हमे इस बारे में क्या हुक्म देता है अल्लाह पाक का हमारे लिए क्या हुक्म है

की अगर किसी को कोई  अपने बिरादरी में कोई लोई पसन्द आये तो क्या उसे मंगनी या निकाह का पैगाम

दे सकते है या नहीं.

निकाह कहा करे ?

मुसलमान औरतो का पर्दा

 निकाह का पैगाम

मंगनी या <yoastmark class=

आयत:- अल्लाह रब्बुल इज्जत इरशाद  फरमाता है:

मंगनी या निकाह् का पैगाम
मंगनी या निकाह् का पैगाम

तर्जमा:- और तुम पर गुनाह नहीं इस बात में की जो पर्दा रखकर (पर्दा के साथ ) तुम औरतो को

निकाह का पैगाम दो (सुर: बकरा रुकू 13, आयत २३५, तर्जमा कन्जुल ईमान )

जब किसी लड़की या औरत से  शादी का इरादा हो तो उसे शादी का पैगाम देने से पहले देखले की उस लड़की

या औरत को किसी और शख्स ने पहले से ही पैगाम तो नहीं दिया है. या उस लड़की की मंगनी नहीं

हो गई है. अगर किसी और ने उस लड़की को निकाह का पैगाम दिया हो या उसके रिश्ते की बात किसी के

मुतल्लिक  चल रही हो तो उसे हरगिज़ पैगाम न दे की उसे शरीअते इस्लामी से सख्त नापसंद किया

गया है . चुनांचे हदीसे पाक में है :-

हदीस:- हज़रत अबू  हुरैरा व हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ी अल्लाहु अन्हुम  से रिवायत है की ,

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया –

मंगनी या <yoastmark class=

कोई शख्स अपने इस्लामी भाई के पैगाम पर उसी लड़की को निकाह का पैगाम न दे.

यहाँ तक के पहले खुद इरादा तर्क कर दे या उसे पैगाम भेजने की इज़ाज़त दे.

किसी को पैगाम भेजना मंगनी के लिए ?

मंगनी असल में निकाह का वादा है अगर यह भी न हो तो जब भी कोई हरज नहीं लिहाजा

बेहतर तो यह है की,मंगनी की रस्म बिलकुल  खत्म कर दी जाए उसकी कोई जरुरत नहीं.

आजकल उसे एक जरुरी रस्म बना लिया गया है और उसे शादी की तरह निभाते है , शादी की तरह,

उसमे खर्च करते है. इस रस्म में रुपयों की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं . लिहाज़ा इस रिवाज़ को छोड़ना

ही बेहतर है . मंगनी की रस्म में मुसलमानों में कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाता है गैर जरुरी काम को

बड़ी दिलचस्पी के साथ तवज्जो के साथ किया जाता है. गालिबन हमने ये रस्म हिन्दुओ से सीखी है

क्यूंकि इस अंदाज़ से रस्म की अदाइगी सिवाए हिंदुस्तान व पकिस्तान के और कही नहीं पाई जाती

बल्कि अरबी फारसी जबानो में इसका कोई नाम भी नहीं है. उसके जितने भी नाम मिलते है

सब हिन्दुस्तानी जुबान के है, चुनांचे मंगनी, सगाई, कढाई, साख, वगेरह. यह उसके नाम है.

 निकाह का पैगाम

अगर मंगनी करना जरुरी ही है तो उसे निहायत ही सादगी से कर ले. इस तरह हो की लड़के के कुछ

रिश्तेदार लड़की के यहाँ जमा हो जाए. और उनकी खातिर व तवाजो लड़की वाले चाय, पानी, शरबत,

से कर दे . लड़के वाले अपने साथ दुल्हन के लिए एक सूती रुमाल और एक चांदी की अंगूठी एक

नग वाली  पेश करदे बस यह हो गयी मंगनी और अगर दुसरे शहर से लड़के वाले आये है तो

उनके साथ दस बारह लोगो से ज्यादा का मजमा न हो और दुलहन वाले मेहमान के लिहाज से

उनको खाना खिला दे मगर उस खाने में दुसरे मोहल्ले वालो की आम दावत की कोई जरुरत नहीं .

इस पोस्ट में हमे मालूम हुआ की अगर किसी को कोई पसंद हो तो वो इज्जत व अदब के साथ किसी

और को निकाह के लिए पैगाम दे सकता है लेकिन उससे पहले यह देखले की उसे किसी और की तरफ से

पैगाम नहीं आया है.  अल्लाह पाक हमे इज़ाज़त देता है की हम अपने पसंद के रिश्ते के लिए

निकाह जा पैगाम परदे में अदब के साथ दे सकते है और मंगनी बड़ी न करते हुए मुख्तसर

घर वाले लोगो के साथ मिलके बात पक्की कर सकते है

वहाबियो से निकाह करना कैसा ?

निकाह क्यों जरुरी है ?

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