निकाह के बाद

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम, अस्सलाम अलैकुम इस पोस्ट में हम निकाह के बाद क्या करना चाहिए ये  मालुम करेंगे जब निकाह हो जाये तो उसके बाद कोन से काम है जो करना जरुरी है दुनियावी रस्मो से ज्यादा हमारे इस्लामी तरके को तवज्जोह देना चाहिए तो आईये जानते  निकाह  बाद का बयान

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तोहफे , जहेज वगेरह के मसले

निकाह हो जाये तो उसके बाद मिसरी और खजूर बांटना बेहतर है .यह रिवाज हुजुर सल्लल्लाहो तआला अलैहि

व सल्लम के जाहिरी ज़माने में भी था . हज़रत मुहक्किक शाह अब्दुलहक़ मुहद्दिस देहलवी रज़ी अल्लाहु तआला

अन्हु नक़ल फरमाते है :- हुजुर सल्लल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम ने जब हज़रत अली व हज़रत फातिमा

रज़ी अल्लाहु तआला अन्हुमा का निकाह पढाया तो निकाह के बाद हुजुर अलैहिस्सलाम ने एक तबाक खजूरो का

लिया और जमाअते सहाबा पर बिखेर कर लुटाया , इसी बिनाह पर फुकहा की एक जमात कहती है की

मिसरी व बादाम वगेराह का बिखेर कर लुटाना निकाह की ज्याफत में मुस्तहब है

(मदरिजुन्नुन्बुवह जिल्द २, सफा नं. १२८ )

आला हज़रत रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु इएशाद फरमाते है “निकाह के बाद खजूर छुहारे हदीस में

लुटने का हुक्म है  और लुटाने में कोई हरज नहीं और यह हदीस दार कुतनी व बैहकी व तहतावी से

मरवी है “(अल्मल्फुज , मल्फुजाते आला हज़रत जिल्द 3, सफा नं. 16 )

मालूम हुआ की निकाह के बाद मिसरी व खजूर लुटाना चाहिए , यानि लोगो पर बिखेरे , लेकिन लोगो को भी

चाहिए की वह अपनी जगह पर बैठे रहे और जिस कद्र उनके दामन में गिरे वह उठा ले ,

ज्यादा  हासिल करने के लिए किसी पर न गिर पड़े

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निकाह के बाद 

निकाह होने के बाद दुल्हे को  दोस्त व अहबाब और दुल्हन को उसकी सहेलियां मुबारकबाद और बरकत

की दुआ दे.

हदीस:- हज़रत अबू हुरैराह रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है :-“जब कोई शख्स निकाह करता

तो हुजुर सल्लल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम उसको मुबारकबाद देते हुए उसके लिए दुआ फरमाते

बरकल्लाहो लाका वबारका अलैका वाजामाआ  बैनाकोमाफी खैरिन 

तर्जमा:- अल्लाह तआला मुबारक करे और तुम पर बरकत नाजिल फरमाए और तुम दोनों 

भलाई रखें (तिरमिजी शरीफ )

निकाह के बाद 

लड़की को जहेज देना सुन्नत है

हदीस:- हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है :-

इन्ना आइशाता जव्वाजात यातिमातन कानत  इन्दाहा फाजह्हाजा हा रसूल अल्लाहि 

सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम मीन इन्दिही 

हज़रत आइशा  रज़ी अल्लाहु तआला अन्हा ने एक यतीम बच्ची का निकाह किया जिसे 

आपने पाला था तो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने उसको अपने पास से 

जहेज दिया 

(मुस्तनद इमाम आजम बाब नं. १२२, सफा नं २१४ )

निकाह के बाद

इस हदीस से मालुम हुआ की जहेज देना सुन्नते रसूल है. मगर जरुरत से ज्यादा देना और कर्ज लेकर

देना दुरुस्त नहीं , जहेज के लिए भी कोई हद होनी चाहिए की जिसकी हर कोई गरीब हो या अमिर

इंसान पाबंदी करे अमीरो को चाहिए की वह अपनी बेटियों को जरुरत से ज्यादा जहेज न दे

, सजा सज्जा कर दिखाकर जहेज देना बिलकुल मुनासिब नहीं , नामवरी की लालच में अपने घर को

आग न लगाये याद रखिये की नाम और इज्जत तो अल्लाह  तआला और रसूलल्लाह की पैरवी

में है .

रिवायत :- हज़रत इमाम मुहम्मद रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु के पास एक शख्स आया और अर्ज करने लगा की

मैंने कसम खायी थी की अपनी बेटी को दुनिया की हर चीज़ दूंगा और दुनिया की हर चीज़ तो बादशाह भी

नहीं दे सकता अब मै क्या करू की मेरी ये कसम पूरी हो जाए आपने फरमाया की तू अपनी लड़की को जहेज

में कुराने करीम दे दे क्योंकि कुरआन शरीफ में हर चीज़ है . फिर यह आयत पढ़ी :-

वला  रताबिंन वला याबेसिंन इल्ला फी किताबिंन मुबीन (तफसीर रुहुल बयान, पारा गयारवाह ,

सुरह युनुस की पहली आयत की ताफिसर में )

लड़के वालो को चाहिए की लड़की वाले अपनी हैसियत के मुताबिक जिस कद्र भी जहेज दे उसे ख़ुशी ख़ुशी

कबुल कर लें की जहेज दरअसल तोहफा है किसी किस्म की तिजारत नहीं लड़के वालो का अपनी

तरफ से मांग करना  ये वो चीज दो तो किसी हठधर्मी भिखारी से कम नहीं .

निकाह के बाद मसला:- 

जहेज की सभी चीजो पर सिर्फ औरत का हक़ है दुसरे का उसमे कुछ हक़ नहीं (फतावा रजविया

जिल्द 5, सफा नं ५२९ ) हमरे मुल्क में यह रिवाज हर कौम में पाया जाता है की निकाह के बाद दुल्हन

वाले दुल्हे को कुछ तोहफा देते है जिसमे कपड़ा वगेरह के साथ सोने की अंगूठी भी होती है

जहेज देने में कोई हरज नहीं पर अंगूठी सोने की न हो

मसला:- मर्द  को किसी भी धातु का जेवर पहनना जाईज़ नहीं औरत को सोने की अंगूठी और

सोने  चांदी के जेवर  पहनना और दुसरे जेवर पहनना जाईज़ है क्यूंकि यह औरत की ज़ीनत है

मर्द सिर्फ चांदी की एक अंगूठी पहन सकता है लेकिन उसका वजन साढे चार माशा से कम होना चाहिए

दूसरी धातु जैसे लोहा पीतल , जस्त, ताम्बा , वगेराह इन धातु की अंगूठी औरत और मर्द दोनों को

पहनना नाजायिज़ है (कनुने शरियत जिल्द २ , सफा नं. १९६ )

निकाह के बाद 

 हदीस :-हज़रत अब्दुल्लाह बिन बरीदा रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु अपने वालिद माजिद से रिवायत करते है की

” एक शख्स हुजुर सल्लल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम की खिदमत में पीतल की अंगूठी पहनकर

हाजिर हुए  सरकारे दो आलम सल्लल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया की

” क्या बात है ? तुम से बुतों की बू आती है ” उन्होंने वह अंगूठी फेंक दी फिर दुसरे दिन वो शख्स

लोहे की अंगूठी पहनकर हाजिर हुए  आपने फरमाया ” क्या बात है की तुम पर जहन्नमियो का

जेवर देखता हूँ ” फिर उन्होंने अर्ज किया या रसुल अल्लाह  फिर किस चीज़ की अंगूठी बनाउ?”

आपने इरशाद फरमाया ” चांदी की और उसके साढे चार माशे से ज्यादा न करना “

(अबू दाउद शरीफ जिल्द 3, बाब नं. २९२ , हदीस नं. ८२१ , सफा नं. २७७ )

मसला:- मर्द को दो अंगूठियाँ पहनना , चाहे चांदी की ही क्यों न हो , सख्त नाजायिज़ है इसी तरह एक

अंगूठी  में कई नग हो या साढ़े चार माशे से ज्यादा वजन की हो तो वह भी नाजायिज़ व गुनाह है

( अहकामे शरियत जिल्द २, सफा नं. १६० )

मसला:-अंगूठी का नगीना हर किस्म के पत्थर का हो सकता है . अकिक, याकुत, जुमर्रद, 

फिरोजा, वगेराह सब का नगीना जाईज़ है (दुर्रे मुख्तार व रद्दुल-मुहतार , कानुने शरियत 

जिल्द २, सफा नं. १९६) लिहाजा दुल्हे को सोने की अंगूठी न दे , बल्कि उसकी बजाये उसकी कीमत के बराबर 

कोई और तोहफा या चांदी की सिर्फ एक अंगूठी एक नग वाली साढ़े चार माशा से कम वजन की ही दें 

वरना देने आले और पहनने वाला दोनों गुनाहगार होंगे.

निकाह के बाद दुल्हे को तोहफा देना 

हो सकता है आपके दिल में यह ख्याल आये की अगर हम चांदी की अंगूठी दुल्हे को देंगे तो लोग क्या 

कहेंगे और ज्तोयादा बदनामी होगी तो  होशियार हो जाईये क्यूंकि यह सब शैतानी वस्वसे है 

इब्लीस मरदूद इसी तरह बदनामी का  खौफ दिलाकर लोगो से गलत काम करवाता है इसलिए अपने दिलसे 

सोचिये की आपको अल्लाह व रसूल की खुशनूदी चाहिए की लोगो की वाह वाही ? सोचिये और अपने 

ज़मीर से ही इसका जवाब तलब कीजिये शादी के मौके पर अक्सर दुल्हे को घडी दी जाती है 

जिसके मुतल्लिक यानि घडी की ज़ंजीर के मुतल्लिक यहाँ कुछ मसाईल बयां किये जाते है 

इन पर अमल करना जरुरी है . सरकारे सैय्यदी  आला हज़रत इमाम अहमद रजा कादरी रज़ी अल्लाहु 

अन्हु अपने एक फतावा में इरशाद फरमाते है: :घडी कि ज़न्ज़िर (चैन) सोने, चांदी की मर्द को हराम है.

और दूसरी धातु जैसे लोहा पीतल, इस्टिल वगेराह की मम्नुअ . उनको पहनकर नमाज पढ़ना 

और इमामत करना मक्ररूहे तहरिमी  है (ना जाईज़ व गुनाह है )

(अहकामे शरियत जिल्द २, सफा नं. १७० )

मसाईल :-

हुजुर मुफ़्ती आज्मे हिन्द रहमतुल्लाह अलैह अपने फतावा में इरशाद फरमाते है :

“वह घडी जिसकी चेन सोने या चांदी या इस्टिल वगेराह किसी भी धातु की हो , उसका इस्तेमाल 

नाजायिज़ है और उसको पहनकर नमाज पढ़ना गुनाह है, और जो नमाज पढ़ी वाजिबुल-एआदा है,

यानि इस नमाज का दोबारा पढ़ना वाजिब है वरना गुनाहगार होगा ( बहवाला : माहनामा इस्तेकामात 

, कानपुर जनवरी १९७८ ) 

इसलिए हमेशा वही घडी पहने जिसका पट्टा चमड़े , प्लास्टिक, या रेग्जीन , या कपडे वागेरह का हो 

स्टील या किसी और धातु का न हो शाद्दी के मौके पर भी अगर दुल्हे को तोहफे में घडी देना हो तो सिर्फ 

चमड़े या  प्लास्टिक के पट्टे वाली ही घडी दें  

 

 

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