महर का बयान

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम 

महर का बयाँन | महर की कितनी किस्म है | महर के बारे में पूरी  जानकारी 

अस्सलाम अलैकुम इस पोस्ट में हम महर का बयान क्या है ? यानि महर के लिए हमे क्या हिदायत दी गयी है  ये जानेंगे 

और महर कितने किस्म का होता है ?, इस बात पर गौर करेंगे  इस  टॉपिक को जानना बहुत ही ज्यादा जरुरी है .

 देखा गया है की आज कल मुसलमानों में बड़ी तादाद में ऐसे लोग है जो निकाह कर लेते है लेकिन उन्हें 

इस बात की मालूमात नहीं होती जैसे महर कितने किस्म का होता है ? और उनका निकाह किस किस्म के महर 

पर हुआ है लिहाज़ा मुसलमानों को यह जां लेना जरुरी है . 

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महर का बयान
महर का बयान

महर तिन कीस्म के होते है 

  1. महरे मुज्जल : महरे मुअज्ज्ल यह है की खल्वत से पहले महर देना करार पाया हो (चाहे दिया कभी भी जाए )
  2. महरे मुव्ज्जल :– महरे मुव्ज्ज्ल यह है की महर की रकम देने के लिए कोई वक़्त मुकर्रर कर दिया जाये .
  3. महरे मुतलक :- महरे मुतलक यह है की जिसमे कुछ तय न किया जाये 

(फतवा मुस्तफ्विया जिल्द 3सफा नंबर ६६, बहारे शरियत , जिल्द 1, हिस्सा नंबर 7, सफा नंबर ३७)

इन तमाम महर की किस्मो में महरे मुअज्ज्ल रखना ज्यादा अफज़ल है, (यानि रुखसती से पहले ही ,महर अदा कर 

दिया जाये . (कनुने शरियत जिल्द २, सफा नंबर ६०) 

महर का बयान 

मसला :- महरे मुअज्जल वसूल करने के लिए अगर औरत चाहे तो अपने आपको शोहर से रोक सकती है .

यानि यह इख्तियार है की वती (मुबाशरत ) से रोके  रखे . और मर्द को हलाल नहीं की औरत को मजबूर 

करे या उसके साथ  किसी तरह की जबरदस्ती करे , यह हक औरत को इस वक़्त तक हासिल है जब तक महर 

वसूल न कर ले. इस दरमियान अगर औरत चाहे तो अपनी मर्जी से हमबिस्तरी कर सकती है . इस दौरान भी

मर्द अपनी बीवी का नांन व न्फ्का बंद नही कर सकता जब मर्द औरत को उसका महर दे दे तो औरत को 

अपने शोहर को हमबिस्तरी करने से रोकना जाएज़ नहीं 

( फतवा  मुस्तफ्विया जिल्द 3, सफा नंबर ६६, कनुने शरियत जिल्द २, सफा नंबर ६०)

मसला:- इसी तरह अगर महरे मुवज्जल था ( यानि  महर अदा करने की एक ख़ास मुद्दत मुकर्रर थी )

और वह मुद्दत खत्म हो गयी तो औरत शोहर को हमबिस्तरी करने से रोक सकती है 

(कनुने शरियत जिल्द २, सफा नंबर ६०)

महर का  बयान 

मसला:- औरत को महर माफ़ करने के लिए मजबूर करना जाएज़ नहीं ( कनुने शरीयत जिल्द २, सफा नंबर ६०)

ज्यादा तर लोग महर को इस ज़माने में रस्म ही समझते है , महर देना कोई जरुरी नहीं एसा समझते है .और 

कुछ लोगो का ख्याल है की महरे तलाक के बाद ही दिया जाता है. और कुछ लोग समझते है की महर इसलिए 

रखते है की औरत को महर देने के खौफ से तलाक नहीं दे सकेगा . 

इन्ही सब बातो की वजह से बहुत से लोग हमारे यहाँ हमरे वतन में महर ही नहीं देते है , एक रस्म समझ कर 

यहाँ तक की  इन्तेकाल के बाद उनके ज़नाजे पर बीबियो से महर माफ़ कराया जाता है , या वे माफ़ करती है .

लेकिन वैसे महर माफ़ कर देने से महर माफ़ तो हो जाएगा लेकिन महर अदा किये  बगैर दुनिया से चले जाना 

मुनासिब नहीं , एसा हुआ की खुदानख्वास्ता  पहले औरत का इन्तेकाल हो गया और वह माफ़ न कर सकी 

या महर माफ़ करने का उसे वक़्त नहीं मिला तो हक्कुल अब्द में गिरफ्तार और दिन व  दुनिया में रुसवा 

व शर्मसार होगा और क़यामत में सख्त पकड़ और सख्त अज़ाब होगा. 

लिहाज़ा इस से बचने के लिए महर अदा कर देना ही चाहिए इसमें सवाब भी है और यह हमारे प्यारे  आक़ा 

सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सुन्नत भी है 

आयत :- हमारा रब अजजा व जल्ला इरशाद फरमाता है :

व आतु लिन्ना आ सदक़तिहिन्ना न्ह्लाता  और औरतो को उनके महर ख़ुशी से दो 

(सुरह निसा तर्जमा कन्जुल ईमान )

आयात :- और फरमाता है अल्लाह अज्ज व जल्ला :-

फमा इस्तमतातुम  बिही मिन्हुन्ना फातु हुन्ना ओजुराहुन्ना फरिदाता .

तो जिन औरतो को निकाह में लाना चाहो उनके बंधे हुए महर उन्हें दो (सुर निसा कन्जुल ईमान )

महर का बयान 

मसला:- औरत अगर होश व हवास की दुरुस्तगी में राज़ी ख़ुशी से महर माफ़ कर दे तो ,महर माफ़ हो जाएगा 

हा गर किसी तरह की धमकी दे यानि मारने की धमकी देकर महर माफ़ कराया और औरत ने खौफ की वजह से 

माफ़ कर दिया तो इस सूरत में माफ़ नहीं होगा , और औरत के मरते वक़्त जो महर माफ़ कराते है 

तो इस सूरत में वारिसो की इजाजत के बगैर महर माफ़ नहीं होगा 

(फतावा आलमगिरी जिल्द 1, सफा नंबर २९३, मुख्तार मआ शामी जिल्द २, सफा नंबर ३३८)

जहालत :- आज कल अक्सर जहालत की वजह से मुसलमान अपनी हैसियत से बढ़कर महर बाँध 

लेते है की देना तो नहीं है और क्या फर्क पड़ता है की ज्यादा महर बंधा ये सख्त ही जहालत वाली बात है 

और अपने दिन से भी मजाक है ऐसे लोगो के लिए इस हदीस में  सबक है इससे उन लोगो को इबरत 

हासिल करना चाहिए 

हदीस :-अबू यला व तबरानी व बैहकी हज़रत  उक्ब़ा बिन आमिर रज़ी अल्लाहूँ तआला अन्हु से रावी है की 

हुजूरे अकद्स सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- ” जो शख्स निकाह करे और 

नियत यह हो की औरत को महर में से कुछ न देगा तो जिस रोज़ मरेगा जानी मरेगा “

(अबू यला, तबरानी, बैहकी , ब हवाला  बहारे  शरियत, जिल्द1, हिस्सा नंबर 7, सफा नंबर ३२)

लिहाज़ा महर इतना ही रखे जितना देने की हैसियत हो और महर जितनी जल्दी हो सके अदा कर दे की 

यही अफज़ल तरिका है . 

महर का बयान 

हदीस:- रसूले मकबूल सल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते है :

” औरतो में वह बहुत बेहतर है जिसका हुस्न व जमाल ज्यादा हो और महर कम हो “

(कीमिया-ए-सआदत सफा नंबर २६० )

हुजुर सैय्यदना इमाम मुहम्मद गजाली रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु फरमाते है : ” बहुत ज्यादा महर बांधना 

मकरूह है लेकिन हैसियत से कम भी न हो ” (कीमिया-ए-सआदत , सफा २६० )

कुछ लोग कम से कम महर  बांधते है और दलील यह देते है की रुपये पैसो से क्या होता है दिल मिलना चाहिए 

यह भी गलत है , महर की अहमियत को घटाने के लिए अगर कोई कम महर बांधे तो यह भी ठीक नहीं 

औरतो को अपना महर  ज्यादा लेने का हक़ है और इस हक़ से उनको कोई मर्द नहीं रोक सकता 

महर की ज्यादा से ज्यादा कितनी मिकदार हो यह हद्दे शरियत में मुतऐय्यंन  है.

हदीस:- हदीसे पाक में हे : महर दस दिरहम चांदी से कम न हो 

मसला:-  महर  की कम से कम मिकदार  दस दिरहम चांदी है  और दस दिरहम चांदी दो तोला साढ़े सात 

माशा के बराबर होती है . लिहाजा इतनी चांदी निकाह के वक़्त बाज़ार में जितने की मिले कम से कम इतने 

रूपये का महर हो सकता है , इससे कम नहीं हो सकता है .

(फतावा आलमगिरी  जिल्द्द 1 , सफा नंबर 283, फतावा फैजुर्रसुल  जिल्द 1, सफा ७१२ )

तो मोहतरम और नाजरीन आपने देखा की महर की कितनी किस्म होती है और पूरी जानकरी भी हमने पढ़ी 

उम्मीद है आपको ये पोस्ट अच्छी लगी हो अल्लाह पाक हमे कहने सुनने से ज्यादा  अमल करने की तौफीक अता फरमाए 

आमीन या रब्बुल आलमीन ! 

 

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