मुसलमानों के बहाने

बिस्मिल्ल्ह हिर्रहमान निर्रहीम ,  अस्सलाम अलैकुम आज की इस पोस्ट में हम मुसलमानों के  चंद बहानों

पर एक नजर डालेंगे , बहाने इसलिए की जो शादी में रस्मो के नाम पर होने वाली बेपर्दगी है उन्हें

हमे बंद ही नहीं करना है बस किसी न किसी बहाने से उन्हें चालू ही रखना चाहते है इसकी पीछली

पोस्ट में पढ़ा था की मुसलमानों में शादी में रस्मो के नाम पर किस कदर बेहयाई और बेपर्दगी की

जाती है आज हम जानेंगे की मना कर्ण के बावजूद भी लोग क्या क्या बहाने बना कर उन फिजूल

रस्मो को निभा रहे है यह भी पढ़े :-शादी की रस्मे

यह भी पढ़े :-महर का बयान

शादियों की फिजूल रस्मे और बहाने 

जब रस्मो की खराबिया मुसलमानों को बताई जाती है तो उनके चंद बहाने होते है एक तो यह

की क्या करे !

हमारे औरते और लड़के नहीं मानते हम उनकी वजह से मजबूर है यह बहाना महज बेकार है .

हकीकत यह है की आधी मर्जी खुद मर्दों की भी होती है तभी उनकी औरते घर के बच्चे लड़के लडकिया

उनके नरम रवय्ये से जिद करते है , वरना मुमकिन नहीं की हमारे घर में हमारे मर्जी के बगैर

कोई काम हो .

अल्लाह पाक सबकी की नियत से खबरदार है. घर के कुछ बुजुर्गो को देखा गया है की आगे आगे बेटे की

बरात नाच गाने के साथ जा रही है और पीछे पीछे यह हज़रत भिभी लाहौल पढ़ते हुए चले जा रहे है .

“क्या करे बच्चे नहीं मानते ?” अगर आपको यकीं है की ये काम इतना बुरा है की लाहौल पढ़ना पढ रहा है

तो अप उस जगह क्या कर रहे है वह से चले क्यों नहीं जाते यानि आप लाहौल भी पढ़ रहे है और उसमे

शामिल भी है यानि आप की भी मर्जी है .हजरते शेख सअदी शिराजी रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु ने

क्या खूब फरमाया है “की लहौला गोयन्द शादी कुंना”

मुसलमानों के बहाने
मुसलमानों के बहाने

मुसलमानों के बहाने 

दुसरा बहान यह होता है की हमको उलेमा ए अहले सुन्नत ने यह बाते बताई ही नहीं और न उससे

रोका इसलिए हम लोग इससे गाफिल है . अब जब की यह रस्मे आम हो चुकी है लिहाज़ा उनका

बंद होना मुश्किल हो गया है यकीनना यह बहना भी गलत है. उलमा ए अहले सुन्नत ने इन रस्मो से

हमेशा अपने बयान व तकरीर में मना किया है . इसके लिए किताबे भी लिखी है.

जबकि मुसलमानों ने हमेशा उसे नजरंदाज किया और उसे काबुल न किया . चुनांचे इमाम ए

अहले सुन्नत आला हज़रत मुहद्दिस बरेलवी अलैहिर्रहमा ने हमेशा बुरी रस्मो उर बुरी बिदअतो के खिलाफ

रसायिल लिखे. आपने एक किताब लिखी जलियुस्सौते लेनहइद्दावते अमामल मौते  जिसमे आपने

साफ़ साफ़ फ़रमाया की मय्यत के चहल्लुम का खाना अमीरों के लिए नजयेज़ है सिर्फ गुरबा व

मसकीन ही खाए एक किताब लिखी “हादेउन्नासे फी रुसुमिल-एरास ” जिसमे शादी ब्याह की हराम

रस्मो की बुराईया और शरई अहकाम व शरई रस्मे बयान फरमाई , एक और किताब “मुज्व्व्जहुन्नजा

ला खुरुजन्निसायी ” जिसमे यह साबित फरमाया की सिवाए चंद मौको के बाकि जगह औरत को घर से

निकलना हराम है , दो किताबे लिखी “शिफाउल -वाला फी सुवरिल -हबिबे व मजरिहू व नेआलिही ” और

अतायन लेक्दिरे फी हुक्मित्तस्विरे ” जिसमे तस्वीर खिचवाने और बनवाने को हरम फ़रमाया .

किस किस किताब का जीरा करे आला हज़रत ने सैकडो किताबे इन उन्वानात पर तसनिफ

फरमाई है आखिर में एक और किताब का नाम सुनिए “इस्लामी ज़िन्दगी” जो हजरत हकिमुल-उम्मत

मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी रहमतुल्लाह अलैह ने ख़ास शादी ब्याह की रस्मो के मुताल्लिक लिखी है.

गरज की बहुत से उलेमा ने इन उन्वानत पर किताबे लिखी है.

मुसलमानों के बहाने

मुसलमानों का तीसरा बहाना यह होता है की बहुत से आलिमो के यहाँ भी तो यह रस्मे होती है

की उन आलिम साहब के यहाँ भी ढोल बजे , हल्दी हुई, उनके लड़के की बारात में विडियो शूटिंग हुई वगेरह

इन बहनों के जवाब में यह जरुर कहना पडेगा की दरअसल अहले सुन्नत वाल जमात को जिस कद्र गैरों ने

नुक्सान नहीं पहुचाया इस से कई गुना ऐसे मुज्ब्ज्ब धुल मूल मौलवियों ने नुक्सान पहुचाया है.

इस घर आग लग गयी घर के चिराग से , इससे कतई इनकार नहीं है की ऐसे निम् मुल्ला चंद रुपयों कि

खातिर शरियत के मसाईल को भी मजाक बना देते है , और अपनी नफसानी खावाहिशात को गलत

ताविलो से सही साबित करने की कोशिश करते है फिर ये सेठ साहब के अहसानों तले  दबे होते है इसलिए

उनके सामने इनकी जबान नहीं खुलती लेकिन अजीजो याद रखिये इस्लाम की बुनियाद ऐसे गुमराह

मौलवियों पर नहीं है की उनके कामो को दलील बनाया जा सके हर मुसलमान के लिए कुरआन अहादीस

अयिम्म-ए-दिन , बुजुर्गाने दिन और उलमा-ए-मोतामदीन के अक़वाल ही काफी है . हमे किसी भी काम का

हरम व नजयिज़ होने का सबुत कुरआन व अहदिसो में और मोतमदउलमा-ए-दिन व बुजुर्गो के अक्वाल

में देखना चाहिए न की उन नफस परवर , अमीरों के चापलूस लोगो के कामो से यह भी याद रखिये

बरोजे महशर आपके कामो की पुछ आपसे होगी आप यह कह कर नहीं बच पाएंगे की फला मौलवी

साहब एसा करते थे इसलिए भी हमने एसा किया इल्मे दिन हासिल करना आपका और हमारा भी तो फर्ज है.

मुसलमानों के बहाने

सुनिए हमारे रहमत वाले आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हमे क्या हुक्म इरशाद फरमाते है:

हदीस:- इल्मे दिन हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है लिहाज़ा मुसलमान पर

जरुरी है की वह इल्म हासिल करे और हराम व हलाल ,जाईज़ व नाजायिज़ में तमिजे सीखे.

मुसलमानों का चौथा बहना यह होता है की अगर हम शादी धूम धाम से नहीं करेंगे तो लोग हम को

ताना देंगे की कंजूसी की वजह से ये रस्मे नहीं की और कुछ रिश्तेदार यह कहेंगे की यह मातम की

मजलिस है . यहाँ नाच गाना नहीं जैसा की तीजा पढ़ा जा रहा है . यह बहना भी बेकार है एक सुन्नत को

ज़िंदा करने में सौ शहीदों का सवाब मिलता है क्या यह सवाब मुफ्त में ही मिल जायेगा लोगो के ताने और

अवाम के मजाक पहले  बर्दाश्त करने पड़ेंगे , लेकिन दोस्तों आज भिलोग ताना देने से  कब बाज़ आते है ?

कोई खाने में नुक्स निकलता है कोई किसिस बात में नुक्स   निकलता है कोई अच्छा इन्सान किसी भी वक़्त 

बाख नहीं सकता . लोगो ने अल्लाह व रसूल को एब लगाये उन्हें ताने दिए तो तुम उनकी जबान से किस तरह 

बच सकते हो? पहले तो मुश्किल आयेगी लेकिन इन्शालाह वही ताने देने वाले लोग तुमको दुआए देंगे .

और गरीब व गुरबा की मुश्किलें आसां हो जाएँगी.

मुसलमानों के बहाने 

पांचवा  बहाना यह होता है की अल्लाह तआला ने हमे नवाजा है , हमारे अरमान है अपनी दौलत

लुटा रहे है अपने पैसे खर्च कर रहे है उसमे किसी के बाप का क्या जाता है? भला शाद्की भी कोई बार बार 

होती है?  मौलवियों का तो काम ही है ये मत करो वो मत करो कहना! वगेरह .

मुसलमानों के इस बहाने से गुरुर और तकब्बुर की बू आती है असर यह बात दौलतमंद हजरात कहते है.

सबसे बेहतर तो यह होता है की, मुसलमान अपनी औलाद के निकाह के लिए खातुने जन्नत शहजादिये रसूल 

हज़रत फतिमतुज्जहरा रज़ी अल्लाहु तआला अन्हा के निकाहे पाक को मिसाल बनाते लेकिन अफ़सोस!

आज के मुसलमान  रसूल अल्लाह  सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ,हज़रत मौला अली व हज़रत 

फतिमतुज्जहरा रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा की मुहब्बत का दावा तो जरुर करते है लेकिन उनके तरीके 

पर अमल करने के लिए तैयार नहीं. खुदा की कसम अगर सरकारे कौन व मका सल्लल्लाहु तआला 

अलैहि वसल्लम की मर्जीए मुबारक होती की मेरी लखते जिगर की शादी बड़ी धूम धाम से हो तो 

दुनिया की हर नेअमत आप अपनी साहाबजादी के कदमो में ला कर रख देते . और अगर हुजुर अलैहिस्सलाम 

सहाबाए  किराम को भी शादी के मौके पर धूम धाम करने का हुक्म फरमा देते तो उसके लिए 

हज़रत उस्मान गनि रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु का खजाना मौजूद था. जो एक एक जुंग के लिए 

हज़ार हजार ऊंट और लाखो अशरफिया हाजिरे बारगाह कर देते थे. लेकिन नियत यह थी की 

कियामत तक यह शादी मुसलमानो के लिए मिसाल बन जाये इसलिए निहायत सादगी से यह 

इस्लामी रस्म अदा की गयी. लिहाजा आप सभी से गुजारिश है कि अपनि शादी ब्याह से इन तमाम 

हराम रस्मो को निकल बहार फेको और निहायत सादगी से निकाह की सुन्नत  अदा करो.

मुसलमानों के बहाने 

हदीस:-नबिए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते है :’

“शादी की इस कद्र आसान कर दो की जिना (जिनाकारी) मुश्किल हो जाये आसानी करोमुश्किल में न डालो “

और आखिर में यही दुआ करते है की अल्लाह पाक हमे कहने और सुनने से ज्यादा अमल करने की 

तौफीक अता फरमाए अमिन या रब्बुल आलमीन!

हज़रत जैनब रज़ीअल्लाहु अन्हा

हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा

 

 

 

 

 

 

Leave a Comment