मुसलमान औरतो का पर्दा

अस्सलाम अलैकुम मेरी प्यारी बहनों इस पोस्ट को में आपके लिए लेकर आई हु जिसमे हम परदे की अहमियत के

बारे में बात करेंगे  मुसलमान औरतो का पर्दा केसा हो या औरतो को पर्दा किन किन से करना चाहिए 

के इस दौर में फैशन के ज़माने में हमारी बहुत सी बेहेने है जो आज भी परदे का

एहतेराम करती है अल्लाह पाक उनके लिए क्या फरमाता है और जो बेहेने पर्दा नहीं करती उन्हें क्या

फरमाता है . ये पढेंगे अल्लाह व रसूल ( जल्ला जलालहू व सल्लाहू अलैहि वसल्लम ) ने इंसानी फितरत के

तकाजो के मुताबिक बदकारी के दरवाजे को बंद करने के लिए औरतो को परदे में रहने का हुक्म दिया है .

यह भी पढ़े :निकाह किन लोगो से जाईज़ नहीं ?

वहाबियो से निकाह करना कैसा ?

"</p

मुसलमान औरतो का पर्दा

परदे की फर्ज़ियत और उसकी अहमियत कुरआन माजिद और

हदीसो से साबित है . चुनानांचे कुरआन माजिद में अल्लाह तआला ने औरतो पर पर्दा फ़र्ज़ फरमाते हुए इरशाद फरमाया की-

मुसलमान औरतो का पर्दा
मुसलमान औरतो का पर्दा

तुम अपने अपने घरो के अंदर रहो और बेपर्दा होकर बाहर न निकलो जिस तरह पहले जमाने में दौरे जाहिलियत में

औरते बेपर्दा बहार निकल कर घुमती फिरती थी .

इस आयत में अल्लाह तआला ने साफ साफ औरतो पर पर्दा फ़र्ज़ करके यह हुक्म दिया है की वह घरो के अंदर

रहा करे और जमानाये जाहिलियत की बेहयाई व बेपर्दगी की रस्मो को छोड़ दे  जमानाये जाहिलियत में

कुफ्फारे अरब का यह दस्तूर था की उनकी औरते खूब बन स्वर कर बे पर्दा निकलती थी और बाजारों और

मेलो में मर्दों के दोश बदोश घुमती फिरतो थी. इस्लाम ने इस बेहयाई से रोका और हुक्म दिया की औरते

घरो के अंदर रहे और बिला जरुरत बाहर न निकले और अगर किसी जरुरत से उन्हें घर से बाहर निकलना

ही पड़े तो ज़माना जाहिलियत के मुताबिक बनाव सिंगार करके बेपर्दा न निकले बल्कि परदे के साथ बाहर निकले

पर्दा इज्ज़त है बेईज्ज़ती नहीं 

हदीस शरीफ में है रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  ने फ़रमाया है की औरत पर्दे में रहने की चीज़ है

जिस वह वो बेपर्दा होकर घर से बाहर निकलती है तो शैतान उसको झांक झांक कर देखता है

(तिरमिजी जी. 1. स. १३९)

इसी तरह हज़रत अबू मूसा अशअरी  राज़िअल्लाहू अन्हु से रिवायत है की हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

ने फ़रमाया जो औरत खुशबु लगाकर मर्दों के पास से गुजरे ताकि लोग उसकी खुशबु सूंघे वह औरत बदचलन है

(नसाई )

प्यारी बहनों आजकल जो औरते बनाव सिंगर करके और  उरिंया लिबास पहनकर खुशबु लगाये बे पर्दा

बाजारों  में घुमती फिरती है और सिनेमा, थियेटरो में जाती है, वह इन हदीसो की रौशनी में  अपने बारे में

खुद ही फैसला करे की वह कौन है? और कितनी बड़ी गुनाहगार है .

मुसलमान औरतो का पर्दा

ए अल्लाह की बंदियों ! तुम खुदा के फज्ल से मुसलमान हो अल्लाह व रसूल ने तुम्हे ईमान की दौलत से

मालामाल किया है. तुम्हारे ईमान का तकाजा यह है की तुम अल्लाह व रसूल के अहकाम को सुनो और उनपर

अमल करो अल्लाह व रसूल ने तुम्हे परदे में रहने का हुकम  दिया है. इसलिए तुम को लाजिम है की तुम परदे

में रहा करो . और अपने शोहर बाप दादाओ की इज्जत व अजमत और उनके नामूस को बर्बाद न करो

यह दुनिया की चंद रोज़ा जिंदगी आणि फानी है . याद रखो ! की एक दिन मरना है और फिर क़यामत के दिन

अल्लाह व रसूल को मुंह दिखाना है . कब्र और जहन्नम के अज़ाबो को याद रखो.

हज़रत खातुने जन्नत बीबी फातिमा जहरा और उम्मत की माओं यानि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की

मुकद्दस बीबियो के नक़्शे कदम पर चल कर अपनी दुनिया व आखिरत को सवारों.

और खुदा के लिए यहूद व नसारा और मुश्रीकिन की औरतो के तरीको पर चलना छोड़ दो .

मुसलमान औरतो का पर्दा 

आजकल बाज़ मुल्हिद (नास्तिक) किस्म के दुश्मनाने इस्लाम, मुसलमान औरतो को यह कहकर बहकाया करते

है की इस्लाम ने औरतो को परदे में रख कर औरतो की बे इज्जती की है इसलिए औरतो  को पर्दे से निकलकर

हर मैदां में मर्दों के दोश बदोश खड़ी  हो जाना चाहिए  मगर प्यारी बहनों खूब अच्छी तरह समझ लो की

इन मर्दों का प्रपोगंडा इतना गंदा  और घिनावना फरेब और धोखा है की शायद शेतान को भी न सुझा होगा.

प्यारी बहेनो अल्लाह की बंदियों तुम्ही इंसाफ करो और अपने दिमाग से सोचो की तमाम किताबे खुली पड़ी रहती है

मगर कुरान शरीफ पर हमेशा गिलाफ चढ़ा रहता है उसको पर्दे में रखा जाता है . तो बताओ की कुरआन माजिद पर

गिलाफ चढ़ाना यह कुरआन माजिद की इज्जत है या बेईज्जती इसी तरह तमाम दुनिया की मस्जिदे बे पर्दा राखी

गयी है मगर खाना कआबा पर गिलाफ चढा कर उसको परदे में राज्खा गया है तो बताओ के कआबा मुकद्दस पर

गिलाफ चढ़ाना उसकी इज्जत है या बे इज्जती ? तमाम दुनिया को मालुम है की कुरान मजिद और कआबा

मुआज्ज्मा पर गिलाफ चढा कर उन दोनों की  इज्जत व अजमत का एलान  किया गया है की तमाम किताबो में से

सबसे अफज़ल व आला कआबा मुआज्ज्मा है इसी तरह मुसलमान औरतो को परदे का हुक्म देकर अल्लाह व रसूल की

तरफ से इस बात का एलान किया गया है कि, अकवामे आलम की तमाम औरतो में मुसलमान औरत तमाम

औरतो से अफज़ल व आला है.

प्यारी बहनों अब तुम्हे इसका फैसला करना है की इस्लाम ने मुसलमान औरतो को पर्दा में रखकर उनकी

इज्जत बढाई है , या उनकी बेईज्जती की है.

किन लोगो से पर्दा फ़र्ज़ है

हर गैर महरम मर्द ख्वाह वो रिश्तेदार, बाहर रहता हो, या घर के अंदर, हर एक से पर्दा करना औरत पर

फ़र्ज़ है . हा उन मर्दों से जो औरत के महरम हो उनसे पर्दा करना औरत पर फ़र्ज़ नहीं , महरम वह मर्द है

जिनसे औरत का निकाह कभी भी किसी भी सूरत में जाईज़ नहीं हो सकता . मसलन बाप, दादा, चचा, मामू,

भाई, भतीजा, भांजा, पोता, नवासा, ससुर, इन लोगो से पर्दा जरुरी नहीं.

गैर महरम वो मर्द है जिनसे औरत का निकाह हो सकता है जैसे चचाज़ाद भाई, मामुजाद भाई, फ़ुफिजाद भाई,

खालाजाद भाई, जेठ, देवर, वगेरह, यह सन औरत के गैर महरम है. और इन सब लोगो से पर्दा करना

औरत पर फ़र्ज़ है . हिन्दुस्तान में यह बहुत ही गलत और खिलाफे शरीयत रिवाज़ है की, औरते अपने

देवरों से बिलकुल पर्दा नहीं करती बल्कि देवरों से हसी मजाक और उनके साथ हाथापाई तक बुरा करने को

बुरा नहीं समझती हलाकि देवर औरत का महरम नहीं. इसलिए तमाम दुसरे गैर महरम मर्दों की तरह औरतो

को देवरों से भी पर्दा करना फ़र्ज़ है बल्कि हदीस शरीफ में तो यहाँ तक पर्दा की ताकीद है की “अल्हामुल मौत “

यानि देवर औरत के हक़ में एसा ही खतरनाक है जैसे मौत और औरत को देवर से उसी तरह दूर भागना चाहिए

जिस तरह लोग मौत से भागते है ( मिश्कात जी. २, स. २६८)

conclusion सबक

बहरहाल खूब अच्छी तरह समझ लो की हर गैर महरम से पर्दा फ़र्ज़ है, चाहे वह अजनबी हो या रिश्तेदार

देवर, जेठ, वगेरह भी गैर महरम ही है. इसलिए इनसे भी पर्दा करना जरुरी है. इसी तरह  कुफ्फर व

मुश्रीकिन की औरतो से भी मुसलमान औरत को पर्दा करना चाहिए. इसी तरह किन्नर और बदचलन औरतो

से भी औरतो को पर्दा करना लाजिम है . और उनके घरो में आने जाने से रोक देना चाहिए

मसला: औरत का पीर भी औरत का गैर महरम है इसलिए मुरिदा को अपने पिरसे भी पर्दा करना फ़र्ज़ है

और पीर के लिए भी यह जाईज़ नहीं की अपनी मुरिदा को बेपर्दा देखे या तन्हाई में उसके पास बैठे

बल्कि पीर के लिए यह भी जाईज़ नहीं की औरत का हाथ पकड़कर उसको बैअत  करे जैसे की हज़रत

आइशा रज़ियल्लाहू  अन्हा ने औरतो की बैत  के मुतल्लिक फ़रमाया की हुजुर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम ,

“याअय्योहन्नाबियो इज़ज़आकलमौत” से औरतो का इम्तेहान फरमाते थे . जो औरत इस आयत मरे जिक्र

की हुई बातो का इकरार कर लेती थी तो आप उससे फरमा देते थे की मैंने तुझसे बैअत ले ली यह  बैअत

बा जरिया कलाम होती थी . खुदा की कसम कभी भी हुजुर अलैहिस्सलाम का हाथ किसी औरत के हाथ से

बैअत के वक़्त नहीं लगा ( बुखारी जी. २ स. ७२६ )

 

निकाह क्यों जरुरी है ?

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा

Leave a Comment