मुहर्रम में क्या करना चाहिए

बिस्मिल्लाहहिर्र्हमानिर्रिहीम ” अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा ही  मेहरबान व निहायत ही रहम वाला है”

हम इस पोस्ट में पढेंगे की मुहर्रम शरीफ में हमे किन कामो को करना है और किन कामो से बचना है 

मुख़्तसर में हमे इस पोस्ट में मुहर्रम शरीफ में आप मिलाद शरीफ और ग्यारहवी शरीफ की महफ़िलो की तरह ही 

मजलिसो का इंतज़ाम करना चाहिए ताकि लोग  शोहदाए कर्बला राज़ियाल्लाहू अन्हुम के फ़ज़ाइल  व 

वाकिआत से शरफ हासिल कर सके, चूँकि उन वाकियात में सब्र और तहम्मुल और तस्लीम सब्र व शुक्र व  रजा 

पाबंदीए शरियत का बेमिसाल अमली नमूना भी है . इस लिए करबला  के वाकियात को बार बार बयान 

करने से मुसलमानों को दिन पर इस्तेकामत हासिल होगी . जो इस्लाम का  इत्र और ईमान की रूह 

है मगर इस बात का ख़याल रखे की इन मजलिसो में साहबे किराम राज़ियाल्लाहू अन्हुम का भी जिक्र 

खैर होना चाहिए ताकि अहले सुन्नत और शियो की मजलिसो में फर्क रहे.

 

मुहर्रम में क्या करना चाहिए 

मिलाद  शरीफ और ग्यारहवी शरिफ की महफ़िलो का यही मसला है की यह सब जाईज है दुरुस्त है 

और बहुत ही बरकतवाली महफिले है .ही इखलास व मुहब्बत से करना चाहिए और इन महफ़िलो

और मजलिसो में निहायत निहायत ही  और यह यक़ीनन बाइसे  सवाब औए मुस्तहब है इस लिए इनको निहायत 

मुहब्बत व अकीदत के साथ हाजिरी देनी चाहिए इन महफ़िलो से लोगो को रोकना यह वहाबियो का तरीका है 

हरगिज़ हरगिज़ उन लोगो की बात नहीं माननी चाहिए . हा एक बात और मुहर्रम ए ताजियादारी भी नहीं 

करनी चाहिए ढोल ताशे गाना बजाना जोर जोर से चीखकर रोना ये सब काम जाएज़ नहीं है

फातिहा 

मुहर्रम में दस दिनों तक ख़ास तौर से अशुरा के दिन शरबत पिला कर , खाना खिला कर , शिरीनी पर, खिचड़ा पका कर 

शोहदाए कर्बला की फातिहा  दिलाना और उनकी मुकद्दस रूहों  को सवाब पहुचाना ये सब जाएज़ हैऔर सवाब के 

काम है. और इन सब चीजों का सवाब यक़ीनन शोहदाए करबला की रहो को पहुचता है और इस फातिहा और 

इसाले सवाब के लिए हनफी, शाफ़ेई, मालिकी, हम्बली, अहले सुन्नत के चारो इमाम का इत्तेफाक है .

(हिदाया व शरह अकाइद) पहले जमाने में फिरका मोअतजेला और इस जमाने में फिरका वहाबिया इस 

मसला में अहले सुन्नत के खिलाफ है और फातिहा व इसाले सवाब से  मना करते रहते है. 

तुम मुसलमानाने अहले सुन्नत को लाजिम है की हरगिज़ हरगिज़ न उनकी बाते सुनो, न उन लोगो से 

मेल जोल रखो वरना तुम भी गुमराह हो जाओगे और दुसरो को भी गुमराह करोगे .

दसवी मुहर्रम को दुआए अशुरा पढने से उम्र में खैर व बरकत और जिंदगी में फलाह व नेअमत हासिल होती है. 

 मुहर्रम में क्या करना चाहिए 

मुहर्रम का खिचडा :- अशुरा के दिन खिचदा पकाना फ़र्ज़ या वाजिब नहीं है लेकिन इसके हराम व नाज़ायेज़ होने की भी 

कोई दलीले शरई नहीं है. बल्कि एक रिवायत है की, ख़ास अशुरा के दिन खिचड़ा पकाना हज़रत नुह अलैहिस्सलाम 

की सुन्नत है. चुनांचे मनकुल है की जब तूफ़ान से नजात पाकर हज़रत नुह अलैहिस्सलाम की  कश्ती जुदी पहाड़ पर ठहरी तो 

तो अशुरा का दिन था. आपने कश्ती में से तमाम अनाजों को बाहर  निकाला तो फुल (बड़ी मटर ), गेंहू , जौ, 

मसूर, चना चावल, पियाज़ सात किस्म के गल्ले मौजूद थे. आपने उन सातो अनाजों को एक ही हांड़ी में 

मिलाकर पकाया. इसलिए शहाबुद्दीन कलयुबी ने फ़रमाया की मिस्र में जो खाना अशुरा के दिन

“तबिखुल हुबुब ” (खिचडा) के नाम से पकाया जाता है . इसकी असल व दलील यही हज़रत नुह अलैहिस्सलाम 

का अमल है |

 

रोज़े अशुरा की फ़ज़ीलत

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