वलीमा का बयान

अस्सलाम अलैकुम आज की इस पोस्ट में हम वलीमा का बयान पढेंगे और वालिमा के बारे में पूरी जानकारी लेंगे और आजकल बहुत सी जगह यह देखा गया है की लोग वालिमा पर तवज्जोह नहीं  दे रहे है इसलिए वालिमा देना कितना जरुरी है ये बात हमे जाननि चाहिए तो आप भी पढ़िए और आपके दोस्त व अहबाब में भी पहुचाईए 

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वलीमा का बयान 

“वलिमा करना सुन्नते मुअक्कदा है ” (जांन  बुझकर वलीमा न करने वाला सख्त गुनाहगार है )

(कीमिया-ए-सआदत सफा:नं. २६१)

वलिमा यह है की शबे जुफाफ की सुबह को अपने दोस्त , अहबाब अज़ीज़ व अकारिब और मोहल्ला के 

लोगो को अपनी हैसियत के मुताबिक दावत करे, दावत करने वाले का मकसद सुन्नत पर अमल करना हो ,

न यह की मेरी वाह वही हो”

(बहरे शरीयत जिल्द२, हिस्सा नं. 16 स. नं. ३२)

हदीस:- हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु का बयान है की, मुझसे नबिए करीम 

सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया :वलिमा  करो चाहे एक ही बकरी जिबह हो 

हैसियत हो तो वलीमा कम अज कम एक बकरी या एक बकरे का गोश्त जरुर हो की सरकारे दो आलम 

सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने उसे पसंद फरमाया है. लेकिन अगर हैसियत न हो तो फिर अपनी 

हैसियत के मुताबिक किसी भी किस्म का खाना खिला सकते है की इससे भी वलिमा  अदा हो जाएगा .

वलीमा का बयान
वलीमा का बयान

वलीमा का बयान 

हदीस:- हज़रत सफिया बिन्ते शैबा रज़ी अल्लाहु तआला अन्हा फरमाती है :नबिए करीम सल्लल्लाहु तआला 

अलैहि व सल्लम ने अपनी कुछ अज्वाजे मुत्ताहहरात  का वलीमा दो सैर जौ के साथ किया था. (बुखारी शरीफ)

सय्यदना इमाम गजाली रज़ी अल्लाहु तआला  अन्हु “कीमिया-ए-सआदत” में इरशाद फरमाते है :

“वलीमा में ताखीर करना ठीक नहीं अगर किसी शरई वजह से ताखीर हो जाये तो एक हफ्ता के अंदर 

वलीमा करना चाहिए यानि वलीमा में देर नहीं करनी चाहिए  और एक हफ्ते से जयादा दिन गुजरने ने पाए 

(किमिये-ए-सआदत सफान्न. २६१)

मसला:- दावते वलीमा सिर्फ पहले दिन या उसके दुसरे दिन बाद करे यानि दो ही दिन तक यह दावत हो सकती है 

उसके बाद वलीमा और शादी खत्म (बहारे शरियत जिल्द २, हिस्स नं. 16, सफा नं. ३३)

हदीस:- हज़रत इब्ने मसाउद  रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है की, नबिए करीम सल्लल्लाहु तआला 

अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया :

ता अमो अव्वलीन योमिं हक्कुंन व ता आमो   यौमिशशानी सुन्नता व ता अमो  यौमिशःसालिशी सुमआ तन 

वा मन सामियि सामियिअल्लाहु बिही   

पहले दिन का खाना यानि शबे जुफाफ के दुसरे दिन वालिमा करना हक़ है और उसे करना ही चाहिए 

दुसरे दिन का सुन्नत है और तीसरे दिन का खाना  सुनाने और शोहरत के लिए है .

और जो कोई दिखावे के लिए और सुनाने के लिए काम करेगा अल्लाह तआला उसे सुनाएगा 

यानि उसको सजा देगा 

वलीमा का बयान 

हदीस:- हज़रत सईद बिन मुसय्यिब रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु को वलीमा में पहले रोज बुलाया गया तो

दावत मंजूर फरमा ली. दुसरे रोज दावत दी गयी तब भी काबुल फरमाई ,तीसरे रोज बुलाया गया तो 

दावत मंजूर न की बुलाने वाले को कांकरिया  मारी और फरमाया की, यह शेखी बघारने वाले और 

दिखावा  करने वाले है” (अबू दाउद शरीफ जिल्द 3, बाब नं. १३१, हदिस नं. ३४९, सफा नं. १३२)

बुरा वलीमा 

हदीसे पाक में इस वलीमा को बहुत बुरा बताया गया है जिसमे अमीरों को तो बुलाया जाए और 

गुरबा और मसाकिन को फरामोश कर दिया जाये एसी दावत यक़ीनन बहुत बुरी है जिसमे अमीरों 

की खातिर खूब बढ़ चढ़ कर की जाए और गरीबो को नजरंदाज कर दिया जाए . या उन्हें हिकारत की 

नजर से देखा जाए .

हदीस:- हज़रत अबू हुरैराह रज़ी अल्लाहु तआला  अन्हु रिवायत करते है की, रसूले अकरम सल्लल्लाहु 

तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया : शर्रू त आमी त अमो वलिमाती युद ला हल अग्निया 

वा युतराकुल फुकराहा 

सबसे बुरा वलीमा वह खाना है जिसमे अमीरों को तो बुलाया जाये और गरीबो को नजर अंदाज़ कर दिया जाये 

आजकल मुसलमानों में एक नयी रिवायत पैदा ही चुकी है वो ये की दावत में दो किस्म के खाने होते है 

सादा और कम लागत वाला खाना मुसलमानों के लिए और बेहतरीन किस्म के पकवान गैर मुस्लिम  दोस्तों 

के लिए रखे जाते है गैर मुस्लिम दोस्तों की खातिर तवज्जोह इस तरह की  जाती  है की  पुछो मत .

आयत :- अल्लाह रब्बुल इज्जत इरशाद फरमाता है 

इन्नाललाहा बरिअन मिनल  मुशरिकिना व रासुलुहू 

“अल्लाह बेज़ार है मुशरिको से , और बेज़ार है उसका रसूल” 

आयत :- और फ़रमाया अल्लाह तबारक व तआला ने या अय्योहललज़िना  आमानु इन्नामल मुशरिकुना नाजिस अल्हा 

ए ईमान वालो मुशरिक निरे नापाक है (तर्जुमा कन्जुल ईमान )

बुरा वालिमा 

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम इरशाद फरमाते है , ” जो काफिरों की ताजिम 

व तौकीर करे यक़ीनन उसने दिने इस्लाम को ढाने में मदत की ,”

(इब्ने अदि , इब्ने असाकिर,  तबरानी , बैहकी , अबू नईम, फिल-हिल्यती )

तो गौर फरमाईये जिन लोगो के मुतल्लिक अल्लाह व रसूल के यह अहकाम है , उनकी खातिर तवज्जोह में 

इस कद्र मुब्तला होना और मुसलमानों को उनसे कम दर्जे में शुमार करना कहा तक सही है ?

कुछ लोग कहते है की साहब  हिन्दुस्तान में रहते है दिन रात उनके बिच उठना बैठना पड़ता है 

हमारे कारोबारी ताल्लुकात है इसलिए यह सब कुछ करना जरुरी है इसके जवाब में सर्फ इतना ही

बुजुर्गो ने खा है जिनकी किताबो का हमने reference लिया है और वो कहते है 

“ए मेरे भाई ! ज़रा यह तो बताओ की क्या उमुमन यह गैर मुस्लिम भी अपनी शादी विवाह के मौके 

पर मुसलमानों के लिए अलग उनका पसंदीदा खाना रखते है ? जी नहीं तो फिर हम क्यों?

गैर मुस्लिमो से मसलेहत करे”

यक़ीनन एसी दावत ऐसे वालिमा का कोई सवाब नहीं मिलता जिसमे मुसलमानों से ज्यादा कुफ्फारो 

को अहमियत दी जाए 

 

सेहरा

 

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