शादी का बयान

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम  अस्सलाम  अलैकुम दोस्तों इस पोस्ट में हम निकाह या शादी का बयान के बारे में कुछ जरुरी मालूमात हासिल करेंगे मसलंन निकाह कब करे यानि अगर हम शादी के लिए कोई तारीख मुकर्रर कर रहे हो तब क्या देखन चाहिए यानि कोंसी तारीख कोनसा दिन ये सब जानकारी लेंगे

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शबे जुफाफ (सुहागरात ) के आदाब

शादी कब कोंनसी तारीख को करे अहम् मसला

आला हज़रत इमाम अहमद रजा कादरी मुहद्दिस बरेलवी रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु इरशाद फरमाते है

“कुछ लोग का ख्याल है की शादी मुहर्रम के महीने में नहीं करना चाहिए यह ख़याल फिजूल व गलत है

निकाह किसी महीने में मना नहीं (फतावा रज्विया जिल्द 5, सफा नं. १७९ )

मसला:- अक्सर लोग माहे सफर में शादी  नहीं करते, खुसूसन माहे सफर के इब्तेदाई तेरह

तारीखे ज्यादा मनहूस मानी जाती है और उनको तेरा तेजी कहते है यह सब जाहिलियत की बाते है

हदीसे पाक में फरमाया की सफर कोई चीज़ नहीं यानि लोगो का इसे मनहूस समझना गलत है

इसी तरह जिल कदा के महीने को भी बहुत लोग बुरा समझते है और उसे खाली का महिना कहते है

और इस महीने में भी शादी नहीं करते ये भी जहालत की बात है गरज की शादी हर महीने की हर तारीख

को हो सकती है

(बहारे शरियत जिल्द २, हिस्सा नं. 16, सफा नं.१५९ )

शादी का बयान

और कई जगह लोगो में यह बात भी दिखाई देती है की चाँद की पंधरवी तारीख के बद शादी नहीं करते क्यूंकि

वो चाँद को उतरती का चाँद कहते है और उन तारीखों को मुबारक नहीं जानते और हद है की सिर्फ

चाँद की एक तारीख से तो चाँद की पंधरवी  तारीख तक ही तारीखों को मुबारक मानते है और उसे चढ़ता

चाँद कहते है ये सब जाहिलियत है और इस्लाम में उसकी कोई असल नहीं

शरियते इस्लामी के मुताबिक किसी महीने की कोई तारीख मनहूस नहीं होती  बल्कि हमे ये ध्यान में रखना

चाहिए की हर दिन हर तारीख अल्लाह अजजा व जल्ला की बनायीं हुई है .

इसलिए हर महीने की किसी भी तारीख को निकाह करना दुरुस्त है ,

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शादी का बयान

हुजुर सैय्यदना गौसुल-आजम शैख़ अब्दुल-कादिर जिलानी बगदादी रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु नकल फरमाते है

“निकाह जुमेरात या जुमा को करना मुस्तहब है सुबह की बजाये शाम को निकाह करना बेहतर है

और अफज़ल है “(गुनियातुततालेबिंन बाब नं. 5 सफा नं. ११५ )

आला हज़रत इमाम अहमद रजा कादरी मुहद्दिसे बरेलवी रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु “फतावा रजविया ” में

नक़ल फरमाते है :”जुमा के दिन अगर जुमा की अज़ान हो गयी हो तो उसके बाद जब तक नमाज़ न पढ़ ली जाये

निकाह की इजाजत नहीं की अज़ान होते ही जुमा की नमाज़ के लिए जल्दी करना वाजिब है फिर भी अगर कोई

अज़ान के बाद निकाह करेगा तो गुनाह होगा मगर निकाह सही हो जाएगा ”

(फतावा रजविया जिल्द 5 , सफा नं, १५८ )

शादी का बयान

दुल्हा दुल्हन दोनों के माँ बाप का या फिर किसी जिम्मेदार रिश्तेदार का फर्ज़ है की, निकाह के लिए

सिर्फ और सिर्फ सुन्नी आलिम या काजी को ही बुलवाए , काजी वहाबी, देवबंदी, मौदूदी, नेचरी,

गैर मुक्ल्लिद, वगेराह न हो . इमाम इश्के मुहब्बत मुज्द्दीद्दे आलम आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा

कादरी रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु इरशाद फरमाते है “वहाबी से निकाह पढवाने में उसकी

ताजिम होती है जो की हराम है लिहाज़ा उस से बचना जरुरी है ”

(अल-मल्फुज़ जिल्द 3, सफा नं. 16 )

निकाह के शरायित  में यह है की दो गवाह हाजिर हो और उन दोनों गवाहों का भी सुन्नी सहिउल-अकीदा

होना जरुरी है .

मसला:- एक गवाह से निकाह नहीं हो सकता जब तक की दो मर्द या एक मर्द और दो औरते मुसलेमा,

सुन्नी आकेला बालेगा न हो (फतवा रजविया जिल्द 5, सफा नं. १६३ )

मसला:- सब गवाह ऐसे बद मजहब है की जिनकी बद मजहबी हदे कुफ्र तक पहुँच चुकी हो जैसे वहाबी

देवबंदी, राफजी, नेचरी, चकडालवी, कादियानी, गैर मुक्ल्लिद, वगेरह तो निकाह नहीं होगा

(फतवा आफ्रिका सफा नं. ६१ )

हदीस:- हज़रत इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है की हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि

व सल्लम ने इरशाद फरमाया : अल बागायल्लती यन्किहा अन फुसाहुन्ना बेगयरी बय्यिनातींन  

गवाहों के बगैर निकाह करने वाली औरते जानिया है (जिनाकार ) है (तिरमिजी शरीफ )

 

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