शिकवा

 

शिकवा अल्लामा इकबाल की सबसे प्रसिद्ध रचना है जिसमे उन्होंने इस्लाम के स्वर्णयुग
को याद करते हुए खुदा से मुसलमानों के हालत के बारे में शिकायत की है
शिकवा शिकवा शिकवा – अल्लामा इकबाल Shikwa ( poetry ) Allama Iqbaal

<yoastmark class=

शिकवा

क्यूँ  जियां-कार  बनू  सूद-फरामोश  रहूँ

फिक्र -ए-फर्दा न करू महव-ए-गम-ए-दोश रहूँ

नाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँ

हम-नवा मै भी कोई गुल हूँ कि खामोश रहूँ

जुरअत-आमोज मिरी ताब-ए-सुखन है मुझ को

शिकवा अल्लाह से खाकम-ब-दहन  है मुझ को

है  बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर है हम

किस्सा-ए-दर्द सुनाते है कि मजबूर है हम

साज़ खामोश है फ़रियाद से मामूर है हम

नाला आता है अगर लब पे तो मा’जुर है हम

ऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अरबाब-वफ़ा भी सुन ले

खूगर-ए-हम्द से थोडा सा गिला भी सुन  ले

थी तो मौजूद अजल से ही  तिरी ज़ात-ए-कदीम

फुल था जेब-ए-चमन पर न परेशां थी शमीम

शर्त इंसाफ है ए  साहिब-ए-अल्ताफ-अमिम

बू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीम

हम को  जमईयत-ए-खातिर ये परेशानी थी

वरना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थी

हम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंजर

कही मस्जूद थे पत्थर कही  मा’बुद शजर

खूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसा की नजर

मानता फिर कोई अन्देखे खुदा को क्यूँ कर

तुझ को मालुम है लेता था कोई नाम तेरा

कुव्वत-ए-बाजु-ए-मुस्लिम ने किया काम तेरा

बस रहे थे यहीं सल्जुक भी तूरानी भी

अहल-ए-ची चीन में इरान में सासानी भी

इसी मामुरे में आबाद थे यूनानी भी

इसी दुनिया में यहूदी थे नसरानी भी

allamma iqbaal ki shayri

पर तेरे नाम पर तलवार उठाई किसने

बात जो बिगड़ी हुई थी वो बनायीं किसने

थे एक हमी एक तेरे मार्का-आराओ में

खुश्कियो में कभी लड़ते कभी दरियाओ में

दी अजाने कभी यूरोप के कलीसाओ में

कभी अफ्रीका के तपते हुए सहराओं में

शान आँखों में जचती थी जहाँ-दारो की

कलमा पढ़ते थे हमही छाँव में तलवारों की

हम जो जीते थे तो जंगो की मुसीबत के लिए

और मरते थे तेरे नाम की अजमत के लिए

थी न कुछ तेगज़नी अपनी हुकुमत के लिए

सर-ब-कफ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए

कौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरती

बुत-फरोशी के एवज बुत-शिकनी क्यों करती

टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे

पाँव शेरों के भी मैदां से उखड़ जाते थे

तुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे

तेग क्या चीज़ है हम तो तोप से लड़ जाते थे

नक्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम ने

जेर-ए-खंजर भी ये पैगाम सुनाया हम ने

तू ही कह दे की उखाड़ा दर-ए-खैबर किस ने

शहर कैसर का जो था उस को किया सर किस ने

तोड़े मखलूक ख़ुदावंदो के पैकर किस ने

काट के रख दिए  कुफ्फार के लश्कर किसने

किसने ठंडा किया आतिश-ए-कदा इरा को

किसने फिर जिंदा किया तजकिरा-ए-यजदा को

कौन सी कौम फकत तेरी तलबगार हुई

और तेरे लिए जहमत-कश-ए-पैकार हुई

किस की शमसीर जहाँगीर जहाँ-दार हुई

किसकी तकबीर से दुनिया तेरी बेदार हुई

शिकवा

किस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थे

मुंह के बल गिरके हु-अल्लाहु-अहद कहते थे

आ गया एन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़

क़िबला रू हो के जमीं-बोस हुई कौम-ए-हिजाज़

एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़

न कोई बन्दा रहा न कोई बंदा-नवाज़

बन्दा ओ साहब ओ मोहताज़ ओ गनी एक हुए

तेरी सरकार में पहुंचे तो सभी एक हुए

महफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में शहर ओ शाम फिरे

मय-ए-तौहीद को लेकर सिफत-ए-जाम फिरे

कोह में दश्त में ले कर तेरा पैगाम फिरे

और मालुम है तुझको  कभी नाकाम फिरे

दश्त तो दश्त है दरिया भी न छोड़े हम ने

बहर-ए-जुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम ने

सफहा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम ने

नौ-ए-इंसा को गुलामी से छुड़ाया हमने

तेरे का’बे को ज़बिनो से बसाया हमने

तेरे कुरआन को साइन से लगाया हम ने

फिर भी हमसे ये गिला है की हम वफादार नहीं

हम वफादार नहीं तू भी तो दिलदार नहीं

उम्मते और भी है उन में गुनहगार भी है

इज्ज़ वाले भी है मस्त-ए-माय-ए-पिंदार भी है

उन में काहिल भी है गाफिल भी है होशियार भी है

सैंकड़ो है की तेरे नाम से बे-जार भी है

रहमते है तेरी अग्यार के काशानो पर

बर्क गिरती है तो बेचारे मुसलमानों पर

बुत सनम-खानों में कहते है  मुसलमान गए

है ख़ुशी उनको की का’बे  के नुगाहबान  गए

मंजिल-ए-दहर से ऊँटो के हदी-ख्वान गए

अपनी बगलों में दबाये हुए कुरआन  गए

शिकवा

खंदा-जन कुफ्र है एहसास तुझे है की नहीं

ये शिकायत नहीं है उन के खजाने में मामूर

नहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शु’उर

कहर तो ये है की काफ़िर को मिले हर ओ कुसूर

और बेचारे मुसलमान को फक्त वादा-ए-हुर

अब वो अल्ताफ नहीं हमपे इनायत नहीं

बात ये क्या है की पहली सी मुदारत नहीं

क्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाब

तेरी कुदरत तो है वो जिसकी न हद है न हिसाब

तू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाब

रह-रव-ए-दश्त हो सैली-जदा-ए-नौज-ए-सराब

तान-ए-अग्यार है रुसवाई है नादारी है

क्या तेरे नाम पे मरने का एवज ख्वारी है

बनी अग्यार की अब चाहने वाली दुनिया

रह गयी अपने लिए एक खयाली दुनिया

हम तो रुखसत हुए औरो ने सम्भली दुनिया

फिर न कहना हुई तौहीद से खाली दुनिया

हम तो जीते है की दुनिया में तेरा नाम रहे

कही मुमकिन है की सकी रहे न जाम रहे

तेरी महफिल भी गयी चाहने वाले भी गए

शब् की आहे भी गयी सुबह के नाले भी गए

दिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गए

आ के बेठे भी न थे और निकले भी गए

आए उश्शाक गए वादा-ए-फर्दा लेकर

अब उन्हें ढूंड चराग-ए-रुख-ए-ज़ेबा ले कर

दर्द-ए-लैला भी वही  कैस का पहली भी  वही

नज़द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वही

इश्क का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वही

शिकवा

फिर ये आजुर्दगी-ए-गैब सबब क्या मा’नी

तुझको छोड़ा की रसूल-ए-अरबी को छोड़ा

बुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ा

इश्क को इश्क की आशुफ्ता-सरी को छोड़ा

रस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-करनी को छोड़ा

आग तकबीर की सीनों में दबी रखते है

जिंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-हब्शी रखते है

इश्क की खैर वो पहली सी अदा भी न सही

जादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रजा  भी न सही

मुज्तारिब दिल सिफत-ए-क़िबला-नुमा भीं सही

और पाबंदी-ए-आइनए-वफ़ा भी न सही

कभी हमे कभी गैरों से शनासाई है

बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है

सर-ए-फारा पे किया दिन को कामिल तूने

एक इशारों में हजारो के लिए दिल तूने

आतिश-अन्दोज़ किया इश्क का हासिल तू ने

फूंक दी गर्मी-ए-रुखसार से महफ़िल तू ने

आज क्यों साइन हमारे शरर-आबाद नहीं

हम वही सोखता-सामा है तुझे याद नहीं

वादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-महफ़िल न रहा

हौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहा

घर ये उजड़ा है की तू रौनक-ए-महफ़िल न रहा

ए खुशा आँ रोज़ की आई ओ ब-सद नाज़ आई

बे-हिजाबाना सु-ए-महफिल-ए-मा बाज़ आई

बादा-कश गैर है गुलशंन में लैब-ए-जू बैठे

सुनते है जाम-ब-कफ़ नगमा-ए–कु-कु बैठे

दौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसु बैठे

तेरे दीवाने भी है मुन्तजिर-ए-हु बैठे

अपने परवानो को फिर जोक-ए-खुद-अफरोज़ी दे

बर्क-ए-देरीना को फरमान-ए-जिगर-सोजी दे

कौम-ए-आवारा इनां-ताँब है फिर सु-ए-हिजाज़

ले उदा बुलबुल-ए-बे-पर को मजाक-ए-परवाज़

मुज्तारिब-बाग़ के हर गुंचे में है बू-ए-नियाज़

तू जरा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिजराब है साज़

शिकवा

नगमे बेताब है तारो से नीलने के लिए

तुर मुज्तर है उसी आग में जलने के लिए

मुश्किलें उम्मते-ए-मरहूम की आसां करदे

मोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ करदे

जिन्स-ए-नायाब-मोहब्बत को फिर अर्ज़ा करदे

हिन्द के दैर-नशीनो को मुसलमां करदे

जू-ए-खु मी चकद अज हसरत-ए-दैरिना-ए-मा

मी तपाद नाला बी-निश्तर कद-ए-सीना-ए-मा

बू-ए-गुल ले गयी बैरून-ए-चमन राज -ए-चमन

क्या कयामत है की खुद फुल है ग्म्माज़-ए-चमन

अहद-ए-गुल खत्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमन

उड़ गए डालियों से जमजमा-पर्दाज़ए-चमन

एक बुलबुल है की महव-ए-तरन्नुम अब तक

उस के साइन में है नगमो का तलातुम अब तक

कुमरिया शाख-ए-सनोबर से गुरेंजा भी हुई

पत्तिय फुल की झड़ झड़ के परेशां भी हुई

वो पुरानी रौशे बाग़ की वीरां भी हुई

डालिया पैरहन-ए-बर्ग से उर्या भी हुई

कैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उसकी

काश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उसकी

लुत्फ़ मरने में है बाकि न मज़ा जीने में

कुछ मज़ा तो है यही खून-ए-जिगर पिने में

कितने बेताब है जौहर मिरे आईने में

किस कदर जलवे तडपते है मेरे सिने में

इस गुलिस्तां में मगर देखने वाले ही नहीं

दाग जो साइन में रखते है वो लाले ही नहीं

चाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल हो

जागने वाले इसी बांग-ए-दरा से दिल हो

या’नि फिर जिंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल हो

फिर इसी बादा-ए-दैरिना के प्यासे दिल हो

आज़मी खुम है तो क्या मय तो हिजाजी है मेरी

नग्मा हिंदी है तो क्या लय तो हिजाजी है मेरी

अल्लामा इक्बाल की शायरी

 

Leave a Comment