सेहरा

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम, अस्सलाम अलैकुम इस पोस्ट में हम दुल्हे को सजाते वक़्त सेहरा प्र्ह्नाते है उसके बारे में पढेंगे और साथ ही इन बातो पर गौर करेंगे की दुल्हे को सेहरा के अलावा कोंनसी चीज़ दुल्हे को सजाने के लिए दुरुस्त है

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शादी की रस्मे

दुल्हे का सहरा 

सेहरा पहनना मुबाह (जाईज़)है.यानि पहने तो न कोई सवाब और न पहने तो न कोई गुनाह होगा .

यह जो अवाम में मशहूर है की, सेहरा पहनना नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की 

सुन्नत है यह महज बातिल और सरासर झूठ है. 

मुजाहिदे आजम सैय्यदना इमाम अहमद रजा कादरी रज़ि अल्लाहु तआला अन्हु इरशाद फरमाते है:-

“सेहरा न शरीअत में मना है न शरीअत में जरुरी , मुस्तहब है बल्कि ये दुनियावी रसम है.

तो सेहरे को सजाया किया तब भी कुछ नहीं और न सजाया तब भी कुछ नहीं मतलब इस रस्म को किया

तो भी क्या और न किया तो क्या  इसके अलावा जो कोई उसे हराम व गुनाह व बिदअत व जलालत बताये 

वह सख्त झूठा सरासर मक्कार है और जो उसे जरुरी व लाजिम समझे और तर्क को बुरा जाने 

और सेहरा न पहनने वालो का मजाक उडाये वह निहायत ही जाहिल है 

(हादियुन्नास फी रुसुमिल-एरास सफा न. ४२)

दुल्हे का सेहरा खालिस असली फूलो का होना चाहिए गुलाब के फुल हो तो बहुत बेहतर है की गुलाब के 

फुल हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पसीने मुबारक से पैदा हुए है ,

और उसे आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पसंद फरमाया है. जैसा की अहादीस की अक्सर 

किताबो से साबित है .

सेहरा
सेहरा

सेहरा 

हदीस:- हजरत मुहद्दिस सैय्य्दी इमाम शैख़ शहाबुद्दीन अहमद कस्त्लानी रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु 

अपनी तसनिफ मवाहिबुल लदुनिया में और हज़रत मुह्क्किक शाह अब्दुलहक मुहद्दिस देहलवी रज़ि 

अल्लाहु तआला अन्हु शोहरा-ए-आफाक तसनिफ मदारेजुन्नुबुव्वह में रिवायत करते है :

“शबे मेअराज़ हुजूरे अकरम सल्लाल्ल्हू तआला अलैहि वसल्लम के पसीना मुबारक से गुलाब का फुल 

पैदा हुआ . और एक रिवायत में है की चंबेली हुजुर अलैहिस्सलाम के पसीनाए मुबारक से पैदा हुई “

(मवाहिबुल्लदुनिया, मदारेजुन्नुबुव्वह जिल्द१, सफा न. ४८)

हलाकि मुहद्देसीन की इस्तेलाह में यह हदीस सेहत का दर्जा नहीं रखती लेकिन फज़इल में हदीसे जईफ भी 

काबिले एतबार है. जैसा की यही हज़रत इमाम कस्तलानी , हज़रत अबुल -फरह नहरवानी रज़ी अल्लाहु तआला 

अन्हुमा से आगे रिवायत करते है :-“यह हदीसे जिनमे जिक्र हुआ की हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम 

के पसीनए मुबारक से गुलाब पैदा हुआ अगरचे मुहद्देसीन को इसमें कलाम है लेकिन इन हदीसो से जो कुछ 

आया है वह नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दरियाए फज्ल व करम व मोजजात 

में से एक कतरा है और उन कसरत में से बहुत थोड़ा है जिन से परवरदिगार ने अपने हबीब  सल्लल्लाहु तआला 

अलैहि वसल्लम को मुकर्रम फरमाया . मुह्देसिन का उनमे कलाम करना असनाद की तहकीक व तस्बीह 

के लिहाज से है, ना मुमकिन होने की बिना पर नहीं “

(मवाहिबुल्लदुनिया , बा हवाला : मदारेजुन्नुबुवह , जिल्द 1, सफा : ४९)

सेहरा 

हदीस:- हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते है : “जो कोई मेरी खुशबु 

सूंघना चाहे वह गुलाब को सूंघे” (मदारेजुन्नुबुवह , जिल्द 1. सफा न. ४९)

मालूम हुआ की गुलाब का वजूद नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पसीनए मुबारक से है 

और गुलाब को सूंघना गोया सरकार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खुशबु सूंघने के मिस्ल है इसलिए 

उलमा-ए-किराम फरमाते है :

“जब भी कोई गुलाब के फुल को सूंघे तो उसे चाहिए की वह हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम 

पर दरूद शरीफ पढ़े ” 

लिहाज़ा अगर सेहरा पहनना ही है तो खालिस गुलाब या चंबेली के फूलो का सहरा पहने . सेहरे में 

चमक वाली पत्तिया न हो की यह जीनत है. मर्द को जिनत करना और एसा लिबास पहनना जो 

चमकदार हो हराम है. दुल्हन के सेहरे में अगर चमक वाली पत्तिया हो तो कोई हरज नहीं की 

औरतो को जीनत जाईज़ है. 

सेहरा

कुछ लोग सेहरे में रुपये नोट वगेरह लगते है यह फिजूल खर्ची और गुरुर व तकब्बुर की निशानी है और 

तकब्बुर शरीअत में सख्त हराम है . लिहाजा अगर सेहरा सिर्फ खुशबूदार फूलो का ही हो और उस पर 

ज्यादा रुपये बर्बाद न किये जाये की शादी एक दिन की होती है दुसरे दिन सेहरे को न तो पहना  जाता है 

और न ही वह किसी काम का होता है सबसे बेहतर तो यह है की गले में एक गुलाब का हर डाल लिया जाए 

यही ज्यादा मुनासिब है 

 

 

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