हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम 

हज़रत उम्मे सलमा रज़ियलाहू अन्हा | Hazrat Umme Salmaa Raziyallahu anha | Tazkra e salihaat

 

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हज़रत सौदा रज़ियल्लाहू अन्हा

हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा 

आपका नाम ‘हिन्द’ व कुन्नियत ‘ उम्मे सलमा’ है लेकिन आप अपनी कुन्नियत से ही जायदा मशहूर है .

आपके वालिद का नाम ‘हुजैफा’ या ‘सुहैल’ है. और इनकी वालिदा का नाम ‘आतिका बिन्ते आमिर’ है.

आप पहले अबू सलमा अब्दुल्लाह इब्न असद से ब्याही गयी थी. और यह दोनों मिया बीवी मुस्लमान होकर

पहले ‘हबशा’ हिजरत कर गए . फिर हबशा से मक्का मुकर्रमा चले आये और मदीना मुनव्वरा की तरफ

हिजरत करने का इरादा किया चुनांचे अबू सलमा ने ऊंट पर कजावा बांधा और बीबी उम्मे सलमा रज़ियल्ल्लाहू अन्हा 

को ऊंट पर सवार कराया और वह अपने दूध पीते बच्चे को गोद में लेकर ऊंट पर बैठ गयी ,

तो एक दम हज़रत उम्मे सलमा रज़ियलाहू अन्हा  मैके वाले बनू मुगिरा दौड़ पड़े और उन लोगो

नें यह कह कर की हमारे खानदान की लड़की मदीना नहीं जा सकती .

हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा

हज़रत उम्मे सलमा को ऊंट से उतार लिया . यह देख कर हज़रत अबू सलमा के खानदान वालो

को तैश आ गया. और उन लोगो ने हज़रत उम्मे सलमा की गोद से बच्चे को छिन लिया और कहा की

यह बच्चा हमारे खानदान का है.इसलिए हम इस बच्चे को हरगिज़ तुम्हारे पास रहने नहीं देंगे . इस तरह बीवी

और बच्चा दोनों को खुदा के सुपुर्द करके हज़रत अबू सलमा तनहा मदीना मुनव्वरा चले गए

.हज़रत उम्मे सलमा शोहर और बच्चे की जुदाई पर दिन रात रोया करती थी .उनका यह हाल देख कर उनके

एक चाचाजाद भाई को रहम आ गया और उसने बनू मुगिरा को समझाया की आखिर इस गरीब

औरत को तुम लोगो ने उस्के शोहर  और बच्चे से क्यों जुदा रखा है. ?क्या तुम लोग यह नहीं देख रहो हो की

वह एक पत्थार की चट्टान पर एक हफ्ता से अकेली बैठी हुई है. और बच्चे और शोहर की जुदाई में

रोया करती है .

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा

ताज्किराए सलिहात

आखिर बनू मुगिरा के लोग इस पर रजामंद हो गए की हज़रत उम्मे सलमा रज़ियलाहू अन्हा  बच्चे को लेकर अपने शोहर के पास

मदीना चली जाए फिर हज़रत अबू सलमा के खानदान वालो ने भी बच्चे को हज़रत उम्मे सलमा के सुपुर्द

कर दिया और हजरत उम्मे सलमा राज़ियालाहू अन्हा बच्चे को गोद में लेकर हिजरत के इरादे से ऊंट पर

सवार हो गयी मगर जब मकामे तनइम में पहुंची तो उस्मान इब्ने तल्हा रास्ते में मिला जो मक्का का

माना  हुआ एक निहायत ही  शरीफ इनसान था. उसने पूछा की उम्मे सलमा ! कहा का इरादा है ?

उन्होंने कहा की मै अपने शोहर के पास मदीना जा रही हु. उसने कहा की क्या तुम्हारे साथ कोई दुसरा नहीं है .

हज़रत उम्मे सलमा ने दर्द भरी आवाज़ में जवाब दिया , नहीं मेरे साथ मेरे म अल्लाह और मेरे इस बच्चे के

सिवा कोई दुसरा नहीं है. यह  सुन कर उस्मान  इब्ने तलहा को शरीफाना जज्बा आ गया.

और उसने कहा की खुदा की कसम मेरे लिए यह जेब नहीं देता की तुम्हारी जैसी एक शरीफ जादी और

एक शरीफ इंसान की बीवी को तनहा छोड़ दू. यह कह कर उसने ऊंट की मुहार अपने हाथ में ली

और पैदल चलने लगा .

हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा

हज़रत उम्मे सलमा का बयान है की, खुदा की कसम मैंने उस्मान इब्ने तलहा से ज्यादा शरीफ अरब किसी को

नहीं पाया. जब हम किसी मंजिल पर उतारते तो वह अलग दूर जाकर किसी पेड़ के निचे सो रहता और मै

ऊंट पर सो रहती फिर चलने के वक़्त वो ऊंट की मुहार हाथ में लेकर पैदल चलने लगता .

इसी तरह उसने मुझे ‘कुबा’ तक पहुचा दिया तक पहुचा दिया  और यह कह कर वापस मका चला गया की ,

अब तुम चली जाओ तुम्हारा शोहर इसी गाँव में है. चुनांचे हज़रत उम्मे सलमा बा खैरियत मदीना शरीफ

पहुच गयी (जुर्कानी जी. 3 स. २३९) फिर दोनों मिया बीवी मदीना में रजने लगे .चंद बच्चे भी हो गए

मगर सं चार हिजरी में हज़रत अबू सलमा रज़ियल्लाहू  अन्हु की वफात हो गयी. तो हज़रत उम्मे सलमा

राज़ियाल्लाहू अन्हा बड़ी बेकसी में पड़  गयी. चंद छोटे छोटे बच्चो के साथं बेवागी में ज़िन्दगी बसर करना

दुश्वार हो गया .उनका यह हाले जार देख कर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे निकाह फरमा

लिया . और बच्चो को अपनी परवरिश में ले लिया इस तरह आप हज़रत  उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा 

हुजुर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के घर आ गईं

हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा

और तमाम उम्मत की माँ बन गयी . हज़रत बीबी उम्मे सलमा अक्ल व फहम , इल्म व अमल, दियानत व शुजाअत,

के कमाल का एक बेमिसाल नमूना थीं. और फिकह व हदीस की मालूमात का यह आलम था की  तिन सौ अठहत्तर

हदीसे उन्हें जबानी याद थी. मदीना मुनव्वरा में चौरासी बरस की उम्र पाकर वफात पाई. इनके विसाल के साल में

बड़ा इख्तेलाफ है बाज़ मुअर्रिखिन ने सन ५३ हिजरी , बाज ने सन ५९ हिजरी, बाज ने सन ६२ हिजरी लिखा है.

और बाज़ का कौल है की इनका इन्तेकाल सन ६३ हिजरी के बाद हुआ. इनकी मुबारक कब्र जन्नतुल बकिअ

में है. (जुर्कानी जी. 3 स. २३८ से २४२)

तब्सेरा:-

अल्लाहु अकबर! हज़रत बीबी उम्मे सलमा राज़ियाल्लाहू अन्हा की ज़न्दगी सब्रो इस्तेकामात, जज्बये इमानी,

जोशे इस्लामी, जहिदाना ज़िन्दगी, इल्म व अमल, मेहनत व जफा – कशी, अक्ल व फहम, का ऐसा शाहाकार

की जिसकी मिसाल मुश्किल ही से मिल सकेगी उनके कारनामो और बहादुरी की दास्तानों को तारीखे इस्लाम

के औराक में पढ़ कर यह कहना पड़ता है की, ए आसमान बोल, ए जमीं बता, क्या तुमने हज़रत उम्मे  सलमा

रज़ियल्लाहू अन्हा जैसी  शेर दिल और पैकरे ईमान औरत को उनसे पहले कभी देखा था. ?

माँ बहनों तुम प्यारे नबी की प्यारी बीबियो की ज़न्दगी से सबक हासिल करो और  खुदा के लिए सोचो

की वह क्या थीं ? और तुम क्या हो? तुम भी मुसलमान औरत हो खुदा के लिए कुछ तो उनकी ज़न्दगी की

झलक दिखाओ.

अल्लाह पाक हमें कहने सुनने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फरमाए अमिन या रब्बुल अल्मिन!

 

 

 

 

 

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