हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम 

हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा की ज़िन्दगी  पर मुख़्तसर नजर .

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा

 ताज्किराए सालिहात

आप सरकारे मक्का हज़रत अबू सुफियान रज़ियल्लाहू अन्हु के बेटी और हज़रत आमिर मुआविया रज़ियल्लाहू अन्हु

की बहन है . आपकी माँ ‘ साफिया बिन्ते आस’ है जो अमीरुल मोमिनीन हज़रत उस्मान  गनी रज़ियल्लाहू अन्हु की

फूफी है. हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू  अन्हा का निकाह पहले उबैदुल्लाह इब्ने जहश  से हुआ था और मिया बीबी दोनों

इस्लाम कबुल करके हबशा की तरफ हिजरत करके चले गए थे. मगर हबशा जाकर उबैदुल्लाह इब्ने जहश  नसरानी

हो गया और इसाईयों की सोहबत में शराब पीते – पीते  मर गया . लेकिन हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा

अपने ईमान पर कायिम रही और बड़ी बहादुरी के साथ परेशानियों और मुश्किलों का मुकाबला करती रही .

जब हुजुर अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उनके हाल की खबर हुई तो कल्बे नाजुक पर

बेहद सदमा गुजरा और आपने हज़रत उमर इब्ने उमैय्या जमरी रज़ियल्लाहू अन्हु को उनकी दिलजुई के लिए हबशा

भेजा . और नजाशी बादशाहे हबशा के नाम ख़त भेजा की तुम मेरे वकील बन कर हज़रत उम्मे हबीबा के साथ

मेरा निकाह कर दो . नजाशी बादशाह ने अपनी लौंडी अबरहा के जरिये रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

का पैगाम हजरत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा के पास भेजा . जब हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा ने

यह खुश खबरी  का पयाम सूना तो  खुश होकर अबरहा लौंडी को इनाम के तौर पर अपना जेवर उतार कर दे दिया .

हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा
हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा

हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा

फिर अपने ममुजाद भाई हज़रत खालिद इब्ने सईद रज़ियल्लाहू अन्हु को अपने निकाह का वकील बना कर

नजाशी बादशाह के पास भेज दिया और उन्होंने बहुत से मुहाजेरीन को जमा करके हज़रत उम्मे हबीबा

रज़ियल्लाहू अन्हा का निकाह हुजुर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम के साथ कर दिया और अपने पास  से महर

भी अदा कर दिया . और फिर पुरे एजाज के साथ हज़रत शरजिल इब्ने हुस्ना रज़ियल्लाहू अन्हु के साथ मदीना

मुनव्वरा हुजुर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम के पास भेज दिया और यह हुजुर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम की बीवी

तमाम मुसलमानों की माँ बन कर हुजुर के  खानए  नबुव्वत में रहने लगी.

यह सखावत व शुजाअत , दीनदारी, और अमानत व दियानत के साथ बहुत ही कवी ईमान वाली थी.

एक मरतबा इनके वालिद अबू सुफियान जो अभी काफिर थे मदीना में उनके घर आये और रसूल अल्लाह

सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बिस्तर पर बैठ गए . हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा ने ज़रा भी बाप की

परवाह नहीं की, और अपने बाप को बिस्तर से उठा दिया और कहा की मै हरगिज़ इसको गवारा नहीं कर सकती

की एक नापाक मुशरिक रसूल के बिस्तर पर बैठे.  इसी तरह उनके जोशे ईमानी और जज्बये इस्लामी के वाकियात

अजीब अजीब है. जो तारीखों में लिहे हुए है.

हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा

आप  बहुत ही दीनदार और पाकीजा औरत थीं . आपको बहुत सी  हदीसे  याद थी. और इन्तेहाई इबदत गुजार और

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बेइन्तेहा खिदमत गुजार और वफादार बीवी थीं.

सन ४४ हिजरी में मदीना मुन्व्वरा के अंदर उनकी वफात हुई और जन्नतुल बकिअ के कब्रिस्तान में दूसरी

अज्वाजे मुत्तहहरात  के खतिरा में दफ़न हुईं. (जुर्कानी जी. 3, स. २४२, मदारिजुन्नुन्बुवत जी. २ स. ४८१)

तब्सेरा

अल्लाहु अकबर! हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहू अन्हा की ज़िन्दगी कितनी इबरत खेज और ताज्जूब अंगेज है .

सरदारे मक्का की शहजादी होकर दिन के लिए  अपना वतन छोड़कर हबशा की दूर दराज जगह में हिजरत

करके चली जातीं हैं. और पनाह गुजिनो की झोपडी में रहने लगती है फिर बिलकुल नागहा यह

मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ता है की, शोहर जो परदेस के जमीं पर एक तन्हा सहारा था इसाई होकर अलग

थलग हो गया. और कोई दुसरा सहारा नहीं रहा. मगर ऐसे नाजुक और खतरनाक वक़्त में भी ज़रा भी

उनका कदम नहीं डगमगाया और पहाड़ की तरह दिने इस्लाम पर कायिम रहीं. एक ज़रा भी उनका हौसला

पस्त नहीं हुआ. न उन्होंने अपने काफ़िर बाप को याद किया न अपने काफिर भाईयो भतीजों से कोई

मदद तलब की. खुदा पर भरोसा करके एक नामूस परदेस की जमींन  में पड़ी खुदा की इबादत में लगी

रही. यहाँ तक की खुदा के फज्ल व करम और रहमतुल ख़ुदावंदे कुद्दुस ने उनको अपने महबूब की

महबूबा बीबी और सारी उम्मत की माँ बना दिया की क़यामत तक सारी  दुनिया उनको  उम्मुल मोमिनीन

(मोमिनो की माँ) कहकर पुकारती रहेगी .

नसीहत 

ए मुसलमान औरतो ! देखो ईमान पर मजबूती के साथ कायिम रहने और खुदा पर भरोसा करने का फल

कितना मीठा और किस कदर लज़ीज़ होता है. और यह तो दुनिया में अज्र मिला है और आखिरत में

उनको क्या अज्र मिलेगा ? और कैसे-कैसे दर्जात की बाद्शाही मिलेगी इसको खुदा के सिवा कोई नहीं जानता.

हम लोग तो उन दर्जो और मर्ताबो की बुलंदी व अजमत को सोच भी नही सकते. अल्लाहु अकबर !

हज़रत हफ़सा रजियल्लाहू अन्हा

हज़रत सौदा रज़ियल्लाहू अन्हा

 

 

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