हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हा

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम , अस्सलाम अलैकुम आज की इस पोस्ट में हम हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हा आपके बारे में मुख़्तसर तजकिरा पढेंगे , में आपको बता दू हम आने वाली और भी पोस्ट में हम उम्मातियो की माओं का और आप हुजुर अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम आपकी  शहजादियो का और इस्लाम की नेक ख्वातिओनो का तजकिरा पूरी तरह से पढेंगे लेकिन फ़िलहाल में आपको यहाँ मुख़्तसर में तजकिरा ए सालिहात में हज़रत जैनब रजियाल्लाहू  अन्हा का तजकिरा बताती हु गौर फरमाईये और इन नेक शहजादियो के ताज्किरे से और उनकी ज़िन्दगी से सबक हासिल कीजिये .

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हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हा आप रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सब से बड़ी शहजादी है.

जो एलाने  नबुव्वत से दस साल पहले पैदा हुईं . आप इब्तिदाए इस्लाम में ही मुसलमान हो

गईं थीं. और जंगे बद्र के बाद हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने इनको मक्का से

मदीना बुलवा लिया था. मक्का में काफिरों ने इन पर जो जुल्म व सितम के पहाड़ तोड़े उनको

तो पूछना ही क्या? हद तो तब हो गयी जब आप हिजरत के इरादे से ऊंट पर सवार होकर

मक्का से बाहर निकलीं तो काफिरों ने आपका रास्ता रोक लिया . और एक बद नसीब काफिर

जो बड़ा ही जालिम था यानि ‘हब्बार इब्ने असवद ‘ उसने नेजा मारकर उनको ऊंट से जमींन पर

गिरा दिया . जिसके सदमे से आपका हमल साकित हो गया.

यह सीखकर उनके देवर ‘केनाना ‘ जो अगरचे काफिर था . एक दम तैश में आ गया .उसने जंग के लिए

तीर कमान उठा लिया .यह माजरा देखकर ‘अबू सुफियान ‘ दरमियाँ में पड़कर रास्ता साफ़ करा दिया

और आप मदीना मुनव्वरा पहुँच गईं. हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कल्ब को इस वाकिया

से बड़ी चोंट पहुंची, चुनांचे आपने उनके फजाइल में यह इरशाद फरमाया की-

हिया अफ्दालो बानाती उस्बित फियन

यह मेरी बेटियों में इस एतबार से बहुत फ़ज़ीलत वाली है की मेरी तरफ हिजरत करने में इतनी

बड़ी मुसीबत उठायी .

हज़रत जैनब रजियल्लाहू अन्हा
हज़रत जैनब रजियल्लाहू अन्हा

हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हा

फिर आपके बाद आप हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हु के शोहर हज़रत अबुलआस रज़ियल्लाहू अन्हु भी

मक्का से हिजरत करके मदीना आ गए और दोनों एक साथ  रहने लगे . इनकी औलाद में एक लड़का

जिनका नाम “अली” था एयर एक लड़की जिनका नाम “उमामा ” था , ज़िंदा रहे .

इब्ने असाकिर का कौल है की ‘अली ‘ जंगे यारमुक में शहीद हो गए . हज़रत ‘उमामा’ रज़ियल्लाहू अन्हा से

हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बहुत मुहब्बत थी . बादशाहे हबशा ने तोहफे में एक जोड़ा और एक

कीमती अंगूठी दरबारे नुबुव्वत में भेजी तो आपने यह अंगूठी हज़रत उमामा को अता फरमाई .

इसी तरह से किसी ने एक मर्तबा बहुत ही बेशकीमती और इन्तेहाई खुबसूरत एक हार नजर

किया तो सब बिबियां समझती थीं कि, हुजुर अलैहिस्सलाम यह हार हज़रत आईशा रज़ियल्लाहू

अन्हा के गले में डालेंगे मगर आपने यह फरमाया की, यह हार मै उसको पहनाऊंगा जो मेरे घर वालो में

मुझे सबसे प्यारी है . यह फरमाकर आपने यह कीमती हार अपनी नवासी हज़रत उमामा रज़ियल्लाहू अन्हा

के गले में डाल दिया .

 हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हा

सन आठ हिजरी में हज़रत जैनब रज़ियल्लाहू अन्हा का इन्तेकाल हो गया. और हुजुर सल्लल्लाहु

तआला अलैहि व सल्लम ने तबर्रुक के तौर पर अपने मुबारक हाथो से उनको कब्र में उतारा .

उनकी कब्र शरीफ भी जन्नतुल बकिअ मदीना मुनव्वरा में है. (जुरकानी जी. 3, स. १९५ से १९७)

तब्सेरा :-

हुजुर नबीए अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की साहबजादी को इस्लाम लेन की बिना पर

काफिरों ने जिस कद्र सताया और दुःख दिया उससे मुसलमान बीबियो को सबक लेना चाहिए की काफिरों

और जालिमो के जुल्मो पर सब्र करना हमारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर वालो की सुन्नत है.

और खुदा की राह में दिन के लिए तकलीफ उठाना और बर्दाश्त करना बहुत बड़े-बड़े अज्र व सवाब का काम है .

अल्लाह पाक अपने प्यारे हबीब रसूले पाक  सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तुफेल से

कहने सुनने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फरमाए अमिन या रब्बुल आलमीन ! जज़कल्लाह खैर

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