हज़रत हफ़सा रजियल्लाहू अन्हा

तब्बिसेरा स्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम “अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा ही मेहरबान व निहायत ही रहम वाला है “

ताज्किराए सलिहात :’ हज़रत हफसा रजियल्लाहू  अन्हा

हज़रत हफसा रजियल्लाहू अन्हा आप भी रसुलअल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आपकी मुकद्दस  बीवी है और उम्मत

की माओं में से है. आप हज़रत अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रजियल्लाहू अन्हु  की बुलंद इकबाल  साहाबज़ादी  है

और आपकी वालिदा का नाम जैनब बिन्ते मजउन  है. जो एक मशहूर सहाबिया है  यह पहले हज़रत  खुनैस इब्ने हुजाफा

सहमी रजियल्लाहू अन्हु की जौजियात में थी और मिया बीवी दोनों हिजरत करके मदीना मुनव्वरा चले गए .

मगर हज़रत हफ़सा रजियल्लाहू अन्हा के  शोहर जंगे ऊहुद में जख्मी होकर वफात पा गए .

तो सन 3 हिजरी में  रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे निकाह फरमा लिया .

हज़रत खदीजा रज़ियल्लाहू अन्हा

हज़रत  हफ़सा रज़ियल्लाहू अन्हा

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आप भी बहुत शानदार , बुलंद हिम्मत और सखी औरत थी. और फहम व फिरासत और हक गोई व हाज़िर जवाबी में अपने

वालिद ही का मिजाज पाया था अक्सर रोजादार रहा करती थी और तिलावते कुरआन मजिद  और दूसरी किस्म

किस्म की इबादतों में  मसरूफ रहा करती थी. इबादत गुजार होने के साथ साथ फिकह व हदीस के उलूम में भी

बहुत मालूमात रखती थी. शाबान सन ४५ हिजरी में मदीना मुनव्वरा के अंदर  हज़रत हफ़सा  रजियल्लाहू अन्हा की वफात  हुई .

मदीना के हाकिम मरवान इब्ने हकम ने नमाज़े ज़नाज़ा पढाई और उनके भतीजों ने कब्र में उतारा और जन्नतुल बकिअ में

दफ़न हुई वफात के वक़्त उनकी उम्र साथ या तिरसठ बरस की थी . (जुर्कानी जी. 3 स. ३३६ से ३३८)

तब्सेरा :-

घरेलु काम सम्भालते हुए रोजाना इतनी इबादत भी करनी है फिर हदीस व फिकह के हुलुम में भी महारत हासिल

करनी है यह इस बात की दलील है की हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बिबिया आराम पसंद और

खेलकूद में जिंदगी बसर करने वाली नहीं थी . बल्कि दिन रात एक मिनट भी  वह जाए नहीं करती थी और दिन रात

घर के काम धाम या इबादत या शोहर की खिदमत या इल्म हासिल करने में मसरूफ रहा करती थी  सुबहान अल्लाह !

उन खुशनसीब बीबियो की जिंदगी चमक धमक या हल्की सी भी झलक होती तो तुम्हारी जिंदगी जन्नत का

नमूना बन जाती और तुम्हारी गोद में ऐसे बच्चे बच्चिया परवरिश पाते  जिनकी इस्लामी  शान और जहिदाना जिंदगी की अजमत

को देखकर आसमानों के फ़रिश्ते दुआ करते और जन्नत की हरे तुम्हारे लिए ‘आमीन’ कहती .

मगर हाय अफ़सोस की तुम को अच्छा खाने अच्छा लिबास , बनाव सिंगार, करके पलंग पर दिन रात लेटे रेडियो

का गाना  सुनने से इतनी फुर्सत ही कहा की तुम इन उम्मत की माओं  के नक़्शे कदम पर चलो ख़ुदावंदे करीम तुम्हे हिदायत दे

इस दुआ के सिवा हम हमारे लिए और क्या कर सकते है काश हम हमारी इन मुख्लिसना नसीहतो पर अमल

करके अपनी ज़िन्दगी  को इस्लामी सांचे में ढाल ले और उम्मत की नेक बीबियो की फेहरिस्त में अपना नाम

लिखा कर दोनों जहां में सुर्खरू बन जाए

तब्सेरा

अल्लाह पाक हमे कहने सुनने से ज्यादा इन बातो पर अमल करने की तौफीक अता  फरमाए आमीन या रब्बुल आलमीन

दोस्तों खासकर मेरी प्यारी बहनों आप हमारी इन नेक माओं की सिरतो को  पढ़कर अपनी जिंदगी में

इन बातो का इख्तियार करेंगी तो  इंशाल्लाह आप की भी जिंदगी बहुत सुकून बहरी जहा दिमगु सुकून आपको

मिलेगा न कोई घर में झगड़ा न फसाद होगा मिया बीवी के बिच इख्तेलाफ कम होंगे इंशाअल्लाह !

 

हज़रत सौदा रज़ियल्लाहू अन्हा

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