हलाल रोजी का बयान

बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम ,अस्सलाम अलैकुम इस पोस्ट में हम पढेंगे हलाल रोजी  का बयान यानि अल्लाह पाक ने हमे रोजी रोटी कमाने के आदाब और हलाल रोजी के क्या मायने है इस बारे में क्या फरमाता  है ये जानेंगे और कमाना तो सबको चाहिए लेकिन वो क़िस अताढ़ से और कोंसी चीज़ जाएज़ है कोनसी  नाजायेज़ ,रोजाना की जिंदगी में कुछ काम करते हुए मसलन अगर कोई कुछ चीज़ बेचने का काम कर रहा है तो वो उस चीज़ को केसे बेचे और सच झूठ का फर्क करे यानि गलत तरीके से उस चीज़ को न बेचे ये तो बस एक उदाहरन है हम इस टॉपिक को निचे पूरा पढेंगे तो आईये जानते है हलाल रोज़ी कमाने का क्या बयान है ?

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अफज़ल कमाई क्या है ?

इतना कमाना हर मुसलामन पर फर्ज़ है जो अपने बाल बच्चो के गुजारे के लिए  हो . और जिन लोगो का 

खर्चा उसके जिम्मे वाजिब है उनका खर्च चलाने के लिए और अपने कर्जो को अदा करने के लिए काफी हो .

इसके बाद उसे इख्तियार है की इतनी ही कमाई पर बस करे , या अपने और अपने बाल बच्चो के लिए 

कुछ बचाकर माल रखने की भी कोशिश करे किसी के माँ बाप अगर मोहताज़ और तंगदस्त हो तो 

लडको पर फर्ज़ है की कमा कर उन्हें इतना दे की उनके लिए काफी हो जाये 

(आलमगिरी जी. 5 स. ३०५ )

मसला:- सब से अफज़ल कमाई जिहाद है यानि जिहाद में जो माले गनीमत हासिल हुआ .

जिहाद के बाद अफज़ल कमाई तिजारत है , फिर फिर ज़राअत ( खेती-बाड़ी) फिर सनअत ( कोई हुनर )

व हिरफत ( व्यावसाय , उद्योग, कारीगरी, पेशा ) (आलमगिरी जी. 5 स. ३०६ )

हलाल रोजी कमाने का बयान
हलाल रोजी कमाने का बयान

हलाल रोजी  कमाने का बयान 

मसला:- जो लोग मस्जिदों और बुजुर्गो की खानकाहो और दरगाहो में बैठ जाते है और बसर औकात 

के लिए कोई काम नहीं करते और अपने को मुतवक्किल बताते है , हलाकि उनकी नजरे हर वक़्त 

लोगो की जेब पर होती है. इन लोगो ने इसको अपनी कमाई का पेशा बना लिया है और ये लोग तरह तरह के 

मक्र फरेब से काम लेकर लोगो से पेसे वसूलते है इन लोगो का यह तरिका नजाएज़ है .

हरगिज़ यह लोग मुतवक्किल नहीं बल्कि मुफ्तखोर और काम चोर है इससे लाखो गुना अच्छा यह था की 

यह लोग बसर औकात के लिए कुछ काम करते और हलाल रोज़ी खा कर खुदा के फरायिज़ को 

अदा करते (आलमगिरी जी.5 स. ३०६ वगेरह )

मसला:- अपनी जरूरतों से बहुत ज्यादा माल व दौलत कमाना अगर इस नियत से हो की फुकरा 

व मसकीन और अपने रिश्तेदारों की मदद करेंगे तो यह मुस्तहब नहीं बल्कि नफली इबादतों से 

अफज़ल है. और अगर इस नियत से हो की मेरे वकार व इज्जत में इजाफा होगा तो यह भी मुबाह है 

(जाएज़ है) , लेकिन अगर माल कि कसरत और फख्र व तकब्बुर की नियत से ज्यादा माल कमाए 

तो यह मना है (अलाम्गिरी जी. 5, स. ३०६ )

हलाल रोजी  कमाने का बयान 

जरुरी तम्बीह :- याद रखो की माल कमाने की बाज़ सूरते जायिज है और बाज़ सूरते नाज़यिज़ है.हर 

मुसलमान पर फर्ज़ है की जाईज़ तरीको पर अमल करे और नाजायिज़ तरीको से दूर भागे .

अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में इरशाद फरमाया की, 

वला ताकुलू अम वालोकुम बयनिकुम बिलबातिली  

त्तर्जमा:- यानि आपस में एक दुसरे के माल को नाहक मत खाओ . दूसरी जगह कुरआन मजीद में 

रब तआला  ने फरमाया की , कुलु मिम्मंन राजाकाकोमुल्लाहो हलालन तय्येबऊ वत्ता कुल्लाहल लजी 

अन्तुम बिही मुमिनुन तर्जमा:- यानि अल्लाह तआला ने जो रोजी दी है उसमे से हलाल व तय्यिब 

माल को खाओ और अल्लाह से डरते रहो जिस पर तुम ईमान लाये हो .

इन आयतों के अलावा इस बारे में चंद हदीसे भी हम सुनेंगे :-

हदीस:- सही मुस्लिम में हज़रत अबू हुरैरह रज़ी अल्लाहु अन्हु से मरवी है की, हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु 

तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया की अल्लाह पाक है और वह पाक ही को पसंद फरमाता है और अल्लाह 

तआला ने मोमिनो को भी उसी बात का हुक्म दिया जिस का रसूलो को हुक्म दिया , चुनांचे उसने अपने 

रसूलो से फरमाया की :- या अय्यियोहर्रुसुलो कोलुमिन तय्येबाती वामालू सालेहंन 

तर्जमा:- यानि ए रसूलो ! हलाल चीजों को खाओ और अच्छे अमल करो . और मोमिनीन से फरमाया की

याअय्यियोहलज़ीना आमानु मीन तय्यिबाती माराज़क्नाकुम 

तर्जमा :- यानि ए ईमान वालो ! जो कुछ हमने तुमको दिया उसमे से हलाल चीज़ को खाओ .

हलाल रोजी कमाने का बयान 

उसके बाद फिर हुजुर अलैहिस्स्लातु वस्सलाम ने  फरमाया  की एक शख्स लम्बे लम्बे सफर करता है 

जिसके बाल परागन्दा  और बदन गर्द आलूद है ( यानि उसकी हालत एसी है की जो दुआ मांगे 

कबुल हो ) और वो आसमान की तरफ हाथ उठा कर या रब या रब कहता  है (दुआ मांगता है ) 

मगर उसकी हालत यह है की उसका खाना हराम , उसका पीना हराम , उसका लिबास हराम , 

और उसकी गिज़ा हराम फिर उसकी दुआ क्यों कर मकबूल हो (यानि अगर दुआ मकबूल होने की

ख्वाहिश हो ) तो हलाल रोजी  इख्तियार करो की बगैर इसके दुआ कबुल होंने के  तमाम असबाब बेकार है.

(मिश्कात जी.1, स. २४१)

हदीस:- हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु तआला  अलैहि  वसल्लम  ने फरमाया की हलाल कमाई की तलाश भी 

फरायिज़ के बाद एक फ़रीज़ा है (मिश्कात जी.1, स. २४२)

हलाल रोजी कमाने का बयान 

हदीस:- हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि  वसल्लम का इरशाद है की लोगो पर एक एसा जमाना आयेगा 

की आदमी परवाह नहीं करेगा की इस माल को कहा से हासिल किया है ? हलाल से या हराम से ?

(बुखारी व मिश्कात जी.1 स. २४१ )

हदीस:- हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया की जो बन्दा हराम माल हासिल 

करता है अगर उसको सदका करे तो मकबूल नहीं और खर्च करे तो उसके लिए उसमे बरकत नहीं 

और पाने बाद छोड़कर मरे तो जहन्नम में जाने का सामान है ( यानि माल की तिन हालाते है और हराम माल की 

तीनो हालते खराब ही है ) (इमाम अहमद )

मसला:- चोरी, डाका, गसब, खयानत , रिश्वत , शराब, सिनेमा, जुआ, सट्टा , नाच-गाना , झूठ फरेब, 

धोका बजी , कम नाप -तोल , बगैर काम किये मजदूरी और तनख्वाह लेना , सूद वगेरह यह सारी 

कमाईया हराम व नाजायिज़ है( कुरआन व हदीस कुतुबे फिकह )

मसला:- जिस शख्स ने हराम तरीको से माल जमा किया और मर गया तो उसके वारिसो पर यह

लाजिम है की अगर उन्हें  मालूम हो की यह फला फला के माल है तो उनको वापस कर दे और

न मालूम हो तो कुल मलो का सदका कर दे जांन  बुझकर हराम माल को लेना जाएज़ नहीं .

(आलमगिरी जी.5, स. ४०६)

हलाल रोज़ी कमाने का बयान 

खुलासा कलाम यह है की मुसलमान को लाजिम है की हमेशा हराम माल से बचता रहे हदीस शरीफ में है की 

हराम माल जब हलाल माल में मिल जाता है तो हराम माल हलाल माल को भी बर्बाद कर देता है.

इस ज़माने में लोग हलाल व हराम की परवाह नहीं करते यह कियामत की निशानियो में से एक 

निशानी है , लेकिन बहरहाल एक मुसलमान के लिए हलाल व हराम में फर्क करना फर्ज़ है ऊपर हम 

यह हदीस पढ़ चुके है की खुदा के फरयिज़ के बाद हलाल रोजी तलाश करना मुसलमान के लिए 

फ़रीज़ा है . अल्लाह पाक हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन 

या रब्बुल आलमीन ! 

 

 

 

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