हैज़ निफ़ास के मसाइल

दोस्तों इस पोस्ट में हम हैज़ निफ़ास व जुनुबत के मसाइल के बारे में जानेंगे और यह जानना हर एक औरत हो या मर्द बहुत ही जरुरी है  पकी नापाकी के मसाइल  जानना भी जरुरी है हमारी कुछ आदते मसलन गुस्हैल करना और भी एसी चीज़े जिससे हम कुछ तौर पर  महरूम है  शर्म व हया की वजह से हम इन छोटी छोटी चीजों को नज़रंदाज़ कर देते है में यहाँ पर आपकी इसी के बारे में जानकारी  देना चाहती हु और आपको बात दू इल्म हासिल करने में कोई हरज नहीं है उम्मीद है आपको इससे जरुर जानकारी हासिल होगी

हैज़ व निफ़ास के मसाइल
पाकी के मसाइल

हैज़ व निफ़ास व जनाबत का बयान:- बालिगा औरत के आगे के मक़ाम से जो खून आदत के तौर पर निकालता हैउसको हैज़ कहते है . और जो खून बिमारी की वजह से आये उसको इस्तेहाज़ा कहते है .और बच्चा होने के बाद जो खून आता है वह निफास कहलाता है .

हैज़ निफ़ास के मसाइल

मसला :- हैज़ की मुद्दत कम से कम तिन दिन और तिन राते यानि पुरे बहत्तर घंटे है जो खून इससे कम

मुद्दत में बंद होगया वह हैज़ नहीं बल्कि इस्तेहाज़ा (बीमारी की वजह से निकला हुआ खून ) है .

हैज़ की मुद्दत ज्यादा से ज्यादा दस दिन दस राते है अगर दस दिन दस रात से ज्यादा खून आया और

यह हैज़ पहली मर्तबा उसे आया है तो दस दिन तक हैज़ माना जायेगा .और उसके बाद जो खून आया

वह इस्तेहाज़ा है. और अगर पहले उस औरत को हैज़ आ चुके है और उसकी आदत दस दिन से

कम थी तो आदत से जितना ज्यादा हुआ वह इस्तेहाज़ा है . मिसाल के तौर पर यु समझो की

उसको हर महीने में पांच दिन हैज़ आने की आदत थी अब की मर्तबा दस दिन आया तो दसो दिनों हैज़ है .

और अगर 12  दिन खून आया आदत वाले पांच दिन हैज़ के मने जायेंगे और सात दिन इस्तेहाज़ा के और

अगर एक  हालत  मुक्करर न थी बल्कि कभी चार दिन कभी पांच दिन हैज़ आया करता था तो

पिछली मर्तबा जितने दिन् हैज़ के थे , वही अब भी दिन हैज़ के मने जायेंगे और बाकि इस्तेहाज़ा

मना जाएगा .

निफ़ास हैज़ व जुनुबत के मसाइल

मसला :- कम से कम नौ बरस की उम्र से औरत को हैज़ शुरू होगा और हैज़ आने की इन्तेहाई उम्र

पचपन साल है . इस उम्र वाली औरत को आइसा (हैज़ व औलाद से न उम्मीद होने वाली) कहते है

नौ बरस की उम्र से पहले जो खून आये वो हैज़ नहीं बल्कि इस्तेहाज़ा है यु ही पचपन बरस की उम्र के

बाद जो खून आये वह भी इस्तेहाज़ा है . लेकिन अगर किसी औरत को पचपन बरस की उम्र के बाद भी

खालिस खून बिलकुल ऐसे ही रंग का आया जैसा की हैज़ के ज़माने में आया करता था तो उसको

हैज़ मान लिया जाएगा .

जनाबत,  निफास व  हैज़  के मसाइल

मसला:– हमाल वाली औरत को जो खून आया वो इस्तेहाज़ा है

मसला:– दो हैजो के दरमियाँ कम से कम पुरे पंद्रह दिन का फासला जरुरी है , यूँ ही निफास

खत्म होने के दरमियान भी पंद्रह दिन का फासला होना जरुरी है तो अगर निफास खत्म होने के बाद

पुरे पन्द्रह दिन न हुए थे की खून आ गया तो यह हैज़ नहीं बल्कि इस्तेहाज़ा है .

मसला:- हैज़ के छ रंग है -काला, लाल, हरा, पिला, गदला, मटीला.

खालिस सफ़ेद रंग की रतबुत  हैज़ नहीं ( आलमगिरी जी. 1 स. ३४ वगेरह)

मसला:- निफास ( बच्चा होने के बाद जो खून आता है ) की कम से कम कोई मुद्दत मुकर्रर नहीं है

बच्चा पैदा होने के बाद आधा घंटा भी खून आया तो वह निफास है और निफास की ज्यादा से ज्यादा मुद्दत

चालीस दिन रात है .( आलमगिरी जी. स.. 3)

मसला:- किसी औरत को चालीस दिन से ज्यादा खून आया तो अगर उस औरत को पहली ही बार बच्चा

पैदा हुआ है या यह याद नहीं की इससे पहले बच्चा पैदा होने में कितने दिन खून आया था

तो चालीस दिन रात निफास है.

बाकि इस्तेहाज़ा है. और जो पहली आदत मालूम हो तो आदत के दिनों तक निफ़ास है और उससे

ज्यादा  है वह इस्तेहाज़ा है , जैसे तिन दिन निफास का खून आने की आदत थी मगर अब की

मर्तबा पैंतालिस दिन खून आया तो तिस दिन निफ़ास के माने जायेंगे और पंद्रह दिन इस्तेहाज़ा के होंगे

(आलमगिरी जी. 1 स. ३५ वगेरह )

हैज़ व निफ़ास के मसाइल

हैज़ व निफ़ास की हालत में नमाज़  पढ़ना और रोज़ा रखना हराम है इन दोनों में नमाज़े माफ़ है

उनकी क़ज़ा भी नहीं . अलबत्ता रोजो कि क़ज़ा दुसरे दिनों में रखना फ़र्ज़ है और हैज़ व निफ़ास वाली

औरत को कुरआन माजिद पढ़ना हराम है. ख्वाह देख कर पढ़े या जबानी पढ़े. यु ही कुरान माजिद

का छूना भी हराम है हा अगर जुज्दान में कुरआन माजिद हो तो जुज्दान को छूने में कोई हर्ज़ नहीं

मसला:- कुरआन माजिद पढने के अलावा दुसरे तमाम  वजीफे कालिमा शरीफ , दुरुद शरीफ,

वगेराह हैज़ व निफास की हालत में औरत बिला कराहत पढ़ सकती है बल्कि मुस्तहब है की नामजो के

औकातमें वुजू करके इतनी देर तक दुरुद शरीफ और दुसरे वजीफे पढ़ लिया करे जितनी देर में

नमाज़  पढ़ा करती थी , ताकि आदत बाकि रहे (आलमगिरी जी. 1 स. ३६)

मसला:- हैज़ व निफास की हालत में हमबिस्तरी यानि जिमः हराम है , बल्कि इस हालत में नाफ से

घुटने तक औरत के बदन को मर्द अपने किसी उज्व से न छुए की यह भी हराम है . हा अलबत्ता

नाफ से ऊपर घुटने से निचे इस हालत में औरत के बदन को छूना या बोसा लेना जाएज़ है .

(आलमगिरी जी. 1 स. ३७)

मसला:– हैज़ व निफ़ास की हालत में औरत को मस्जिद में जाना हराम है हाँ अगर चोर या दरिन्दे से दर कर

या किसी शदीद मज़बूरी से मजबूर होकर मस्जिद में चली गयी तो जाएज़ है . मगर उसको चाहिए की

तयम्मुम करके मस्जिद में जाये .

मसला:- हैज़ व निफ़ास वाली औरत अगर ईदगाह में  दाखिल हो जाये तो कोइ हर्ज़ नहीं

मसला:- हैज़ व निफ़ास की हालत में अगर मस्जिद से बाहर रह कर और हाथ बढ़ा कर मस्जिद से

कोई चीज़ उठा ले या रख दे तो जाएज़ है .

हैज़ निसाफ़  के मसाइल

मसला:– हैज़ व निफास वाली को खानए  काबा के अंदर जाना और उसका तवाफ़ करना

अगरचे मस्जिदे हराम से हो हराम है. (आलमगिरी जी. 1 स. ३६)

मसला:- हैज़ व निफास वाली हालत में  बीवी को अपने बिस्तर पर सुलाने में गल्बये शहवत या अपने

को काबू में न रखने का अंदेशा हो तो शोहर के लिए लाजिम है की बीवी को अपने बिस्तर पर न सुलाए

बल्कि अगर गुमान ग़ालिब हो की गलबये शहवत पर काबू न रख सकेगा तो शोहर को एसी हालत में

बीवी को अपने साथ सुलाना हराम और  गुनाह है.

मसला:- हैज़ व निफ़ास की हालत में बीवी के साथ हमबिस्तरी को हलाल समझना कुफ्र है

और हरम समझते हुए कर लिया तो  सख्त गुनाहगार होगा . उस पर तौबा करना फर्ज़ है .

और अगर शुरू हैज़ व निफास में एसा कर लिया है तो एक दीनार और अगर करीब खत्म किया तो

आधा दीनार खैरात करना मुस्तहब है ताकि खुदा के गज़ब से अमां पाए.

(आलमगिरी जी. 1 स. ३७ वगेराह )

मसला:- रोज़े की हालत में गर हैज़ व निफास शुरू हो गया तो वह रोज़ा जाता रहा उसकी कज़ा रखे

फ़र्ज़  था तो क़ज़ा फ़र्ज़ है और नफ्ल था तो क़ज़ा वाजिब है .

मसला:– निफास की हालत में औरत को जच्चा  खाना से निकलना  जाएज़ है यूँ ही हैज़ व निफास वाली

औरत को साथ खिलाने और उसका जूठा खाने में कोई हरज नहीं हिंदुस्तान में बाज़ जगह जाहिल औरते

हैज़ व निफास वाली औरतो के बरतन अलग कर देती है. बल्कि उन बर्तनों को और हैज़ वाली

औरतो को नाजिस समझती है याद रखो की ये सब गैर मुस्लिमो की रस्मे है काफिरों की रस्मे है

एसी बेहूदा औरतो से मुसलमान औरतो , मर्दों को बचना लाजिम है

हैज़ निफ़ास  के मसाइल

अक्सर औरतो में रिवाज है की जब तक चिल्ला पूरा न हो जाए अगरचे निफास का खून बंद हो चुका हो

वह न नमाज़ पढ़ती है न अपने आप को नमाज़ के काबिल समझती है . यह भी महज जहालत है.

शरीअत का हुक्म यह है की जैसे ही निफास का खून बंद हो उसी वक़्त से नहाकर नमाज़ शुरू कर दे और

अगर नहाने से बिमारी का अंदेशा हो तो तयम्मुम करके नमाज़ पढ़े . नमाज़ हरगिज़ हरगिज़ न छोड़े .

मसला:- हैज़ अगर पुरे दस दिन पर खत्म हुआ तो पाक होते ही उससे जिमाअ करना जाएज़ है

अगरचे अब तक गुसल न किया हो. लेकिन मुस्तहब यह है की नहाने के बाद सोहबत करे

(आलमगिरी जी. 1 स. ३७)

मसला:- हैज़ व निफ़ास की हालत में सजदाये तिलावत भी हराम है  और सजदे की आयत सुनने से उस

पर सजदा वाजिब नहीं

मसला:– रात को सोते वक़्त औरत पाक थी और सुबह को सोकर उठी तो हैज़ का  असर देखा तो

उसी वक़्त से हैज़ का हुक्म दिया जाएगा रत ही से  हाइजा  नहीं मानी  जाएगी .

मसला:- हैज़ वाली सुबह सोकर उठी और गद्दी पर कोई निशाँन हैज़ का नहीं तो रात ही से पाक मानी  जाएगी

हैज़ व निफ़ास  के मसाइल

इस्तेहाज़ा के अहकाम :- इस्तेहाज़ा में न नमाज़ माफ़ है न रोज़ा , न एसी औरत से सोहबत हराम है

इस्तेहाज़ा वाली औरत नमाज़ भी पढेगी और रोज़ा भी रखेगी कआबा में दाखिल भी होगी

तावाफे काबा भी करेगी कुरआन शरीफ की तिलावत भी करेगी वुजू करके कुरआन शरीफ को भी हाथ

लगाएगी और इसी हालत में शोहर उससे हमबिस्तरी करेगा ( आलमगिरी जी. 1 स. ३७)

जुनुब के अहकाम :- ऐसे मर्द  व औरत जिन पर गुस्ल फ़र्ज़ हो गया ‘ जुनुब’ कहते है. और उस नापाकी की हालत

को जनाबत कहते है . जुनुब चाहे मर्द हो या औरत जब तक गुस्ल न करे वह मस्जिद में दाखिल नहीं हो सकता

न कुरआन शरीफ पढ़ सकता है , न कुरआन में देखकर तिलावत कर सकता है , न जबानी पढ़ सकता है ,

न कुरआन माजिद को छू सकता है , न कअबा में दाखिल हो सकता है, न कअबा का तवाफ़ कर सकता है .

मसला:- जुनुब के साथ खिलाने उसका जूठा खाने उसके साथ सलाम व मुसफहा करने में कोई हरज नहीं

(अबू दाउद जी. 6 स. ३९)

मसला:– जुनुब को चाहिए की जल्द से जल्द गुस्ल करले क्यूंकि रसूलअल्लाह  सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने

फरमाया है की रहमत के फ़रिश्ते उस घर में नहीं जाते जिस घर में तस्वीर , कुता, और जुनुब हो.

(अबू दाउद जी. 1 स. ३४)

इसी तरह एक हदीस में यह भी आया  है की फ़रिश्ते तिन शख्सो के करीब नहीं होते एक काफ़िर का मुर्दा,

दुसरे खुलुक (औरतो की रंगीन खुशबु ) इस्तेमाल करने वाला , तीसरे जुनुब आदमी मगर यह की वुजू करले .

(मिश्कात जी. 1 स. ५०)

हैज़ निफ़ास  के मसाइल

मसला:- हैज़ व निफ़ास वाली औरत या ऐसे मर्द जिन पर गुस्ल फ़र्ज़ है अगर यह लोग कुरआन शरीफ

की तालीम दे तो उनको लाजिम है की कुरआन माजिद के एक एक लफ्ज़ पर सांस तोड़ तोड़ कर

पढाये. मसलन इस तरह पढाये अल्हम्द  पढ़ कर सांस तोड़ दे फिर लिल्लाह पढ़ कर सांस तोड़ दे

फिर रब्बिल आलमीन पढ़े एक सांस में आयत लगातार न पढ़े कुरआन शरीफ के अलफ़ाज़ को

हिज्जे करने में भी कोई हरज नहीं .

मसला:- कुरआन माजिद के अलावा और दुसरे वजीफे कालिमा शरीफ व दुरुद शरीफ वगेराह को पढ़ना

जुनुब के लिए बिला कराहत जाएज़ बल्कि मुस्तहब है . जैसे की हैज़ व निफ़ास वाली औरत के लिए कुरआन

शरीफ के इलावा दुसरे तमाम अज्कार व वाजैफ़ पढ़ना जाएज़ व दुरुस्त बल्कि मुस्तहब है

(आलमगिरी जी. 1 स. ३६)

म अजुर का बयांन

मअजुर का बयान :- जिस शख्स को कोई एसी बिमारी हो जैसे पेशाब के कतरे टपकने या दस्त आने , या

इस्तेहाज़ा का खून आने के अमराज़ की एक नमाज़ का पूरा वक़्त गुजर जाये और वो वुजू के साथ नमाज़े फ़र्ज़

अदा न कर सका तो ऐसे शख्स को शरीअत में मअजुर कहते है  ऐसे लोगो के लिए शरीअत का यह हुक्म

है की , जब किसी नमाज़ का वक़्त आ जाये तो माजुर लोग वुजू करे और उसी वुजू से जितनी नमाज़े चाहे पढता रहे

उस दरमियान अगरचे बार बार  कतरह वगेरह आता रहे मगर उन लोगो का वुजू उस वक़्त तक नहीं टूटेगा

जब तक की उस नमाज़ का वक़्त बाकि रहे . और जेसे ही नमाज़ का वक़्त खत्म हुआ उन लोगो का वुजू टूट

जाएगा. और दूसरी नमाज़ के लिए फिर दूसरा वुजू करना पडेगा (आलमगिरी जी. 1 स. ३८)

मसला:- जब कोई शख्स शरीयत में म अ जुर मान लिया गया तो जब तक हर नमाज़ के वक़्त में एक बार

भी उसका उज्र पाया जाता रहेगा वह म अ जुर ही रहेगा. जब उसको इतनी शिफा हासिल हो जाये

की एक नमाज़ का पूरा वक़्त गुजर जाये और उसको एक मर्तबा भी कतरा वगेराह न आये तो अब यह

शख्स म अ जुर नहीं  माना जाएगा ( आलमगिरी जी. 1 स. ३८)

हैज़ निफ़ास के मसाइल

मसला:- म अ जुर का वुजू उस  चीज़ से नहीं जाता जिसकी वजह से म अ जुर है, लेकिन अगर कोई वुजू

तोड़ने वाली दूसरी चीज़ पाई  गई तो उसका वुजू जाता रहेगा .  जैसे किसी को कतरे का मर्ज़ है

और वह म अ जुर मान लिया गया तो नमाज़ के पुरे वक़्त में कतरा आने से उसका वुजू नहीं टूटेगा

लेकिन  हवा निकलने से उसका वुजू टूट जाएगा

मसला:– अगर खड़े होकर नमाज़ पढने में कतरा आ जाता है और बैठ कर नमाज़ पढने में

कतरा नहीं आता तो उस पर फ़र्ज़ है की नमाज़ बैठ कर पढ़ा करे और वह म अ जुर नहीं शुमार किया जाएगा .

 

 

औरत क्या है ?

 

 

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